Swami Vivekanand Stories in Hindi



                      1.डरो मत सामना करो।


वाराणसी में एक बार स्वामी विवेकानन्द जी दुर्गा माता के मंदिर से निकल रहे थे  ।

फिर वाहा बन्दरो की टोली आ गई और उनको घेर लिया।

Swami Vivekanand Stories in Hindi


 वे उनके नज़दीक आने लगे और डराने लगे . स्वामी जी डर गए और  अपनी जान बचाने के लिए वहां से भागने लगे, पर बंदरों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा।  और वे उन्हें दौडाने लगे।

स्वामी जी भागते भागते मन्दिर के मुख्य प्रांगण में आ गए , वहां पर मंदिर के पुजारी ने जब यह देखा तो उन्होंने स्वामी विवेकानंद जी को रोका और बोला- , ” रुको ! उनका सामना करो !”

विवेकानंद जी पलटे और बंदरो की ओर बढ़ने लगे।
यह देखकर बंदर भी घबराकर भागने लगे।

इस घटना से स्वामी जी को एक गंभीर सीख मिली – ” यदि तुम कभी किसी चीज से भयभीत हो तो उससे भागो मत , पलटो और सामना करो ।”

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                2. व्यक्तित्व की पहचान

जब स्वामी विवेकानंद जी अमेरिका के शिकागो शहर में विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने के लिए गए थे तो जब वे वाहा की गलियों में घूम रहे थे ।

     उस समय उन्होंने हमेशा की तरह अपने गेरूए रंग के सन्यासी वाले कपड़े पहन रखे थे ।

 वहां पर अमेरिका के कुछ नागरिक भी थे जो स्वामी जी के वस्त्रों को देखकर उन पर हंस रहे थे और उनके पीछे - पीछे चलने लगे तथा उन पर हसने लगे ।
 
  बहुत समय तक स्वामी जी चुपचाप बिना कुछ बोले हुए चलते रहे लेकिन कुछ समय बाद वह पीछे मुड़ गए और बोले
- "मैं अच्छे से जानता हूं कि आप सभी मुझ पर क्यों हंस रहे हैं!
आप सभी मेरे पहनावे को देखकर हंस रहे है ।
क्यूंकि आपके देश में आदमी की पहचान उसके पहनावे से होती है लेकिन मेरे देश में आदमी की पहचान उसके कपड़ों से नहीं बल्कि उसकी आत्मा से होती है।"

इतना सुनकर सभी लोग अपने घरों की ओर चले गए।
जब स्वामी जी के भाषण के बारे में इन लोगो ने कुछ दिनों बाद सुना तो वे सभी ही स्वामी जी के शिष्य बन गए।
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                       3. सन्यासी


स्वामी विवेकानन्द जी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर एक बार एक महिला ने उनसे कहा -"स्वामी जी आप मुझसे शादी कर लीजिए ताकि आपसे शादी के बाद जो पुत्र प्राप्त होगा ,वो बिल्कुल आपके जैसा होगा और मुझे आप जैसे व्यतित्व की माता बनने का गौरव प्राप्त होगा ।"

यह सुनकर स्वामी जी हल्का सा मुस्कुराए और कुछ देर तक सोचने के बाद बोले -"मैं एक सन्यासी हूं मेरे जीवन में विवाह का कोई स्थान नहीं है अर्थात मैं विवाह नहीं कर सकता हूं , आप मुझे ही अपने पुत्र के रूप में स्वीकार कर लीजिए । इस प्रकार से आपकी इच्छा भी पूरी हो जाएगी और मेरा सन्यास भी सतत बना रहेगा।"

स्वामी जी का यह कथन सुनकर वह महिला स्वामी जी के चरणों में गिर गई और उसने उनसे क्षमा मांग ली।
   
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                                4.  दोषी कौन?


एक बार नरेंद्र अपनी कक्षा में बैठे थे । उनके शिक्षक आगे से पढ़ा रहे थे। लेकिन नरेंद्र अपने दोस्तो के साथ बातें कर रहे थे।
मास्टर को यह अच्छा नहीं लगा । मास्टर ने अचानक नरेंद्र को उठाया और कुछ प्रश्न पूछे लेकिन नरेंद्र ने सारे प्रश्नों के उत्तर दे दिए ।   
    
जब मास्टर ने नरेंद्र के दोस्तो को भी कुछ सवाल पूछे तो उनको कोई भी उत्तर नहीं आया । उनके दोस्त कुछ भी उत्तर नहीं दे पाए ।

मास्टर ने उन सभी को हाथ ऊपर  करके  खड़े रहने की सजा दी।

   लेकिन उनके साथ नरेंद्र भी हाथ उठाकर खड़े हो गए। 
मास्टर ने उनसे पूछा कि तुमने सारे प्रश्नों के उत्तर दिए और सारे सही भी थे तो फिर तुम क्यों यहां सजा के लिए खड़े हो गए हो ।

नरेंद्र ने उत्तर दिया  - " गुरुजी ! मेरे दोस्त तो केवल मेरी बातो को सुन रहे थे । असल में मै ही बातें कर रहा था, तो इस प्रकार दोषी मेरे दोस्त नहीं बल्कि मै हूं ।"

यह सुनकर मास्टर जी ने कहा कि बेटा नरेंद्र तुम बहुत बड़े आदमी बनोगे ।

मास्टर जी की बातें सत्य साबित हुई । नरेंद्र ने ही स्वामी विवेकानंद के रूप में भारत का गौरव बढ़ाने का कार्य किया। और भारतवर्ष को पुनः विश्वगुरु के पथ पर अग्रसर किया।
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