अच्छे कर्मों का फल - hindi moral story


  यह कहानी एक युवक की मुसीबतों और एक गरीब किसान की है 
लखनऊ शहर में एक अमीर युवक रहता था उसका नाम रमेश था, जो कि अपने काम में बहुत अधिक सफलता प्राप्त करते हुए जीवन में बहुत आगे बढ़ गया था।
moral story in Hindi

 उसका काम अब दूर-दूर तक फ़ैलने लगा ,वह कभी लखनऊ,कभी आगरा कभी बिजनोर और भी बहुत जगह काम के सिलसिले में जाता रहता था।

एक बार उसे काम के सिलसिले में बिजनोर एक मीटिंग में जाना था लेकिन उसके बाकी कर्मचारी दूसरे कामों में व्यस्त थे इसलिये वह अकेले ही बिजनोर के लिए अपनी गाड़ी लेकर निकल पड़ा।

  रमेश को लग रहा था कि वह बिजनोर जल्दी पहुँच जाएगा इसलिये उसने अपने साथ खाने के लिए भी कुछ नही रखा। आसमान में सूरज की गर्मी के कारण मौसम में बहुत गर्मी थी।

 अचानक बिजनोर पहुँचने से लगभग 30 किलोमीटर पहले, जब रमेश नदी के ऊपर बने पुल से जा रहा था,  उसकी गाड़ी का टायर पंचर हो गया उसने गाड़ी से उतर के देखा तो उसकी गाड़ी का पीछे के एक टायर की हवा निकल गयी थी।

 आस-पास बिलकुल सुनसान सड़क थी न कोई मैकेनिक की दुकान थी, जहाँ वो अपनी गाड़ी ठीक करा सके और न कोई होटल था, जहाँ  वह मेकैनिक का इंतजार कर सके

 ऐसे में वह अपना समय बर्बाद नही करना चाहता था क्योंकि उसको बिजनोर जल्दी से पहुँचना था, इसलिये उसने खुद गाड़ी का टायर बदलने की कोशिश की, गाड़ी की डिगी से पाना और एक नया टायर निकाला।

रमेश ने पाने से गाड़ी के नेट बोल्ट निकाले और उनको निकालकर नीचे रख दिया जैसे ही उसने गाड़ी का टायर बाहर की ओर जोर से खींचा तो चारों नेट बोल्ट नदी में गिर गये।

अब उसके ऊपर जैसे मुसीबतों का पहाड़ टूट कर गिर गया हो उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि आखिर बिजनोर कैसे पहुंचा जाये।

 न तो उसके पास खाना था, न कोई मदद करने वाला, और ऊपर से तपती धुप रमेश बहुत परेशान था।

अब तो गाड़ी के बोल्ट भी नदी में गिर गये। तभी पुल से एक किसान अपने बैलों के साथ खेत जोतने जा रहा था, उसका नाम दिनेश था।

 दिनेश ने शहरी युवक को पुल पर परेशान होकर बैठा देखा तो तुरंत उसकी मदद के लिए पुल पर चला गया।

“तुम कौन हो भाई गाँव के तो नहीं लगते हो?”-दिनेश ने पूछा।
“मेरा नाम रमेश है और में अपने काम के सिलसिले में बिजनोर जा रहा हूँ” रमेश ने बताया।
“तुम परेशान लग रहे हो क्या बात है ?” दिनेश ने पूछा।

"क्या बताऊँ मुझ पर मुसीबतों का पहाड़ टूट गया है, मेरी गाड़ी का टायर पंचर होने के कारण में यही पर रुक गया हूँ और अब तो मेरी गाड़ी के बोल्ट भी नदी में गिर गये हैं" रमेश ने अपनी सारी मुसीबत के बारे  में दिनेश को बताया।

दिनेश ने रमेश को पास के पेड़ की छाँव में बैठाया और उसको खाने के लिए रोटी और सब्जी दी इससे रमेश की भुख तो कम हो गयी लेकिन फिर भी वह बिजनोर कैसा पहुंचा जाये इसके बारे में सोचता रहा।

दिनेश ने कहा “चिंता मत करो भाई मेरे पास इसका भी हल है”।
यह सुनकर रमेश का चेहरा खिल गया, उसने कहा जल्दी बताओ भाई मुझको जल्दी से बिजनोर पहुंचना है।

दिनेश ने अपनी तरकीब बताई कि तुम अपनी गाड़ी के बचे तीन टायरों से अगर एक-एक नेट बोल्ट निकालकर चौथे टायर पर लगा दो तो सारे टायरों पर तीन-तीन नेट बोल्ट हो जायेंगे।

 फिर तुम आराम से गाड़ी को चलाकर ले जाना,यहाँ से 10 किमी. दूर एक गैराज है वहाँ पर बाकि नये नेट बोल्ट ले लेना।

रमेश ने बिल्कुल ऐसा हे किया और पंचर टायर पर नेट बोल्ट लगा दिए।
रमेश ने दिनेश से पूछा कि “आखिर तुमको ये सुझाव आया कैसे”?

इस पर दिनेश ने बताया – देखो भाई आपको लग रहा था कि आप चारों ओर से मुसीबतों से घिर गये हो इसलिये तुम केवल मुसीबत के बारे में ही सोच रहे थे लेकिन मैं उन मुसीबतों के बीच में उनका हल ढूंढने का प्रयास कर रहा था इसलिये मुझको आसानी से आपकी मुसीबत का हल मिल गया ।
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 रमेश उसकी बुद्धिमानी से बहुत प्रसन्न हुआ फलस्वरूप उसने दिनेश को उपहार देना चाहा इसलिए उसने अपने जेब से 5000 रुपए निकाले और दिनेश को देने के लिए अपना हाथ बढ़ाया ।

दिनेश खुद्दार था उसने रमेश से पैसे लेने से इंकार कर दिया और वहां से चला गया।रमेश ने दिनेश के जैसा आदमी अपने पूरे जीवन में नहीं देखा था। रमेश अपनी गाड़ी में बैठ गया और पूरे रास्ते दिनेश के बारे में ही सोचता रहा।

जब दिनेश अपनी मीटिंग ख़तम करके वापस आ रहा था तो इसके पुल के कुछ दूरी पर उसने दिनेश को देखा वहां पर दिनेश अपने पिता के साथ बैठा था वह उदास था और दुखी भी ।

रमेश ने उससे बात की तो दिनेश ने कुछ नहीं बताया तो रमेहा ने उसके पिता से पूछा आखिर क्या बात है ?

"दिनेश के बूढ़े पिता ने बताया कि हमने जमीदार से कर्ज लिया था जिसकी भरपाई का आज आखिरी दिन है और हम आधा ही जुटा पाए है ।"
 "अब जमीदार ने कर्ज के बदले हमारी जमीन को लेना चाहता है। हमारे पास जितनी जमीन है उससे ही हम मुश्किल से अपना रोजगार चलाते है।"

रमेश धनी था तो उसने दिनेश की मदद करने के लिए 25 हजार देने की बात की।

किन्तु दिनेश ने अस्वीकार कर दिए,तब रमेश ने उससे पूछा क्या तुम मेरे लिए काम करना पसंद करोगे ? मै तुम्हे बहुत अच्छी पगार दूंगा ?

दिनेश के पिता के सामने उम्मीद की नई किरण आ गई उन्होंने दिनेश को रमेश के साथ काम करने के लिए मना लिया। 

रमेश ने दिनेश को 25 हजार बोनस के रूप में दे दिए।
इस प्रकार रमेश को भी अपने काम को संभालने के लिए एक जिम्मेदार और ईमानदार व्यक्ति मिल गया और दिनेश का कर्जा भी पूरा हो गया।

कहानी से शिक्षा - 

“इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें कभी भी अपनी मुसीबतों से भागना नही चाहिए बल्कि उनका समाधान कैसे किया जाय इसके बारे में सोचना चाहिए और सदैव दूसरों की सहायता के लिए तैयार रहना चाहिए ताकि वे लोग भी आपकी सहायता करें।"


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