Ads By Google

   Moral Stories In Hindi For Class 8

नमस्कार दोस्तों स्वागत है आप सभी का kahanistation पर और आज हम लाए हैं आपके लिए 
कुछ Moral Stories जिन्हें पढ़कर आपको कुछ सीखने को भी मिलेगा।

Moral story in Hindi for Class 8

1.     पिता पुत्र की कहानी 

''यह छोटी सी  कहानी एक पिता अपने बेटे से एक सबक सीखता है''
चंदन एक बढ़ई था। वह एक गाँव में रह रहा था। उनकी मां का काफी समय पहले देहांत हो चुका था ।उनके वृद्ध पिता, कपिल , चंदन  के साथ रहते थे। कपिल  बहुत कमजोर थे। वह ठीक से चल भी नहीं पा रहे थे । वह इतना कमजोर थे के ऐसा इसलिए था क्योंकि चंदन  ने उन्हें पर्याप्त भोजन नहीं दिया था। उसने अपने पिता को एक छोटी मिट्टी की थाली दी थी। थाली में भी थोड़ी मात्रा में चावल ही  दिया। चंदन  एक बुरा आदमी था। वह शराबी भी था। शराब  लेने के बाद, उसने अपने पिता के साथ दुर्व्यवहार किया।

Moral Stories In Hindi For Class 8

चंदन  का एक बेटा था। उसका नाम सत्तू  है। सत्तू  सिर्फ दस साल का था। वह बहुत अच्छा लड़का था। वह अपने दादा से प्यार करता था। अपने दादा के प्रति उनके मन में बहुत सम्मान था। उन्हें अपने पिता का रवैया और चरित्र बिल्कुल भी पसंद  नहीं था, क्योंकि उनके पिता अपने दादा के साथ अच्छा  व्यवहार नहीं  कर रहे थे।

एक दिन कपिल  अपने खाने को मिट्टी की प्लेट से निकाल कर खा रहे थे जो उनके बेटे ने उन्हें दे दी थी। मिट्टी का बर्तन  नीचे गिर गया। प्लेट टुकड़ों में टूट गई। खाना भी फर्श पर गिरा। चन्दन  कमरे के दूसरे छोर पर काम कर रहा था। उसने टूटी हुई प्लेट देखी। वह अपने पिता से बहुत नाराज था और उसने अपने पिता को गाली देने के लिए बहुत कठोर शब्दों का इस्तेमाल किया। बूढ़े आदमी को बुरा लगा उसे अपनी गलती पर खेद था। चंदन  के शब्दों ने उन्हें बहुत गहराई से घायल कर दिया।

चंदन के बेटे सत्तू ने इसे देखा। उसे अपने पिता पसंद नहीं थे। उसके पिता अपने दादा के साथ बुरा बर्ताव कर रहे थे। वह अपने पिता के खिलाफ बोलने से डरता था। वह अपने दादा के बारे में दुखी था। लेकिन वह अपने दादा के समर्थन में खड़े होने के लिए शक्तिशाली नहीं था।

अगले दिन सत्तू अपने पिता के कुछ बढ़ईगिरी के औजार और लकड़ी का एक टुकड़ा ले गया। उन्होंने लकड़ी की प्लेट बनाने के लिए उपकरणों के साथ काम किया। उसके  पिता ने उसे ये काम  करते हुए देखा।

"तुम क्या कर रहे हो, सत्तू ?" उन्होंने पूछा।

"मैं एक लकड़ी की थाली बना रहा हूँ!" सत्तू  ने कहा।

“एक लकड़ी की प्लेट! किस लिए? ” पिता ने पूछा।

“मैं इसे आपके लिए बना रहा हूं, पिता। जब आप बूढ़े हो जाओगे तो मेरे दादाजी की तरह, आपको भोजन के लिए एक प्लेट की आवश्यकता होगी। मिट्टी से बनी एक प्लेट बहुत आसानी से टूट जाती है। तब मैं आपको गंभीर रूप से डांट सकता हूं।
इसलिए, मैं आपको एक लकड़ी की प्लेट देना चाहता हूं। यह इतनी आसानी से नहीं टूट सकता। ”

यह भी पढ़ें - डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम की जीवनी

यह सुनकर बढ़ई हैरान रह गया। केवल अब उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। चंदन के पिता चंदन के प्रति दयालु थे,उन्होंने चंदन की बहुत अच्छी देखभाल की थी। अब, वह बूढ़ा हो गया था। चंदन अपने पिता के साथ गंभीर व्यवहार कर रहा था। चंदन अब अपने व्यवहार से बहुत दुखी था। उसे अपनी गलतियों का एहसास हुआ। वह फिर एक अलग व्यक्ति बन गया।
उस दिन से, चंदन ने अपने पिता के साथ बहुत सम्मान के साथ व्यवहार किया। उसने शराब पीना भी छोड़ दिया। चंदन ने अपने ही बेटे से सबक सीखा।

तो दोस्तों आपने देखा कि किस प्रकार चंदन ने अपनी सूझ - बूझ के दम पर अपने दादाजी की सहायता की और अपने पिता को भी सही मार्ग दिखाया।

कहानी से सीख -
आपको हर समय अपने माता-पिता का सम्मान करना चाहिए। यह आपका कर्तव्य है। यह आपको उनका आशीर्वाद देता है।

Moral Story in Hindi For Class 8 #2


2. आम क्यों फलों का राजा? - हिंदी कहानी 
एक समय था जब सभी फल वाले पेड़ अपने सौन्दर्य पर घमंड करते थे । सभी अपने अस्तित्व का एकमात्र कारण अपने सुंदर पत्तियों की बनावट, अपने फूलों की महक और अपने फलों के स्वाद को हे मानते थे । उनका मानना था कि ये सब हैं, तभी हम जीवित हैं इनके बिना तो हमारा इस पृथ्वी पर कोई अस्तित्व ही नही रहेगा ।

किन्तु उनमें से आम का पेड़ पत्ती फूल या फलों को अपने अस्तित्व का कारण नहीं मानता था क्योकि उसे पता था कि उनका जीवन आधार केवल और केवल उनकी जडे ही हैं। जड़ ही तो हैं जो उनके जन्म से लेकर अन्तकाल तक उनका साथ देती हैं फिर भी उसको अपनी बात अपने तक ही सिमित रखनी पड़ती थी क्योंकि पेड़ उसी बात को मानते थे जिसे अधिकतम पेड़ सहमती देते थे इसलिये वह चुप रहता था।

Short stories In Hindi With Pictures

Moral stories in Hindi for class 8
Moral Story in Hindi For Class 8


समय बीतता गया हरे- भरे पेड़ फूलों से भर गये फिर फूलों से फल बने और जब जीव जन्तुओ ने पेड़ो के फल ,फूल खा लिए और आखिरकार पतझड़ में पेड़ो की पत्तियां सुख कर नीचे गिर गयी तब आम के पेड़ को अपनी बात रखने का मौका मिल गया और उसने सभी पेड़ों से कहा
- देख लो भाई जिसे आप अपने अस्तित्व का कारण मानते थे, वे आज हम सब को छोड़ के दूर हो गये हैं लेकिन हमारी जड़े..हमारी जड़ों ने हमारा साथ हमारे जन्म से लेकर अब तक कभी भी नहीं छोड़ा, जो कि जमीन के अंदर से हमारे पतियों, फूलों, और हमारे फलों का पोषण करती हैंA वही हमारे जीवन के अस्तित्व का कारण हैं वरना इनके बिना हमारा जीवन समाप्त हो जायेगा और हमारी अकाल मृत्यु निश्चित है भले ही हम पतझड़ में सूख गये हों लेकिन बसंत ऋतु आते ही हम पुनः हरे-भरे हो जायेंगे, हमारा सौन्दर्य पुनः लौट आएगा इसलिए जड़े ही हमारे जीवन की नींव हैं ।

Moral Stories In Hindi For Class 8
Moral Story in Hindi For Class 8


  सभी पेड़ों ने आम के पेड़ की इस बात पर अपनी सहमती दी और सभी पेड़ों ने आम को फलों का राजा घोषित किया ।
और इस प्रकार आम फलों का राजा बन गया।

कहानी से सीख - 
जीत उसी की होती है जो सयंम तथा बुद्धिमानी से कार्य करता है।

Moral Stories In Hindi For Class 8 #3

लालच का अंत 

यह कहानी दो बहुत करीबी मित्रो सुकुमार और सुलोचन की है जो प्रतापपुर नामक राज्य में निवास कर रहे थे।दोनों एक ही घर में रहते थे और हमेशा एक दूसरे के सुख दुख को आपस में बांटते थे। दोनों बहुत प्रसन्न रहते थे।

सुकुमार राज्य के राजा कुंवर सिंह के यहाँ भोजन बनाने का काम करता था और सुलोचन राजघराने में मुंशी का काम करता था।दोनों बहुत मेहनती और सफल व्यक्ति थे। राजपरिवार में दोनों को सम्मान दिया जाता था।

सुकुमार अपने भोजन की वजह से राजा का प्रिय था और सुलोचन का हिसाब किताब संभालने का तरीका कुँवर सिंह को बहुत अच्छा लगता था।

राजा और उसके परिवार वाले सुकुमार द्वारा बनाये खाने को चखते ही वाह ... क्या खाना बनाया है! बहुत स्वादिष्ट ....! 

ये तो मेरा फ़र्ज़ है अन्नदाता! - सुकुमार खुशी से उत्तर देता है।

राजा कुँवर सिंह प्रसन्न होकर सुकुमार को हीरे मोती के जौहरात उपहार स्वरूप भेंट करते हैं और सुकुमार की कर्तवयनिष्ठता की बहुत प्रशंसा करते हैं।

सुकुमार द्वारा पकाये स्वादिष्ट भोजन के कारण उसकी राजमहल में खूब चर्चाएँ थीं। यह देखकर सुलोचन भी बहुत खुश हुए।

समय बीतता गया दोनों राजपरिवार का हिस्सा ही बन गए थे। एक के बिना भोजन नहीं पकता और दूसरे के बिना सारा हिसाब किताब खराब हो जाता था।

हमेशा रात्रि के समय सुकुमार राजमहल से इनाम में मिले हीरे जोहरातों को सुलोचन को दिखाता है और इंगित करता है कि स्वादिष्ट भोजन बनाने के लिए ये आज मुझे महाराज ने उपहार दिया है।

अब धीरे - धीरे सुलोचन के मन में सुकुमार के प्रति ईर्ष्या और ज्यादा धन पाने का लालच जागने लगा।

वह राजदरबार के हिसाब किताब में कुछ न कुछ हेरा फेरी कर अपने लिए फायदा निकालने लगा।

इसके बारे में सुकुमार को कुछ पता न चले इसलिए उसने घर जल्दी आकर अतरिक्त धन को घर में सुरक्षित करके छिपा दिया करता था।

आगे भी ऐसा ही होता है एक दिन सुकुमार ने सुलोचन से पूछा कि क्या बात है मित्र मैं पिछले कई दिनों से देख रहा हूँ तुम घर जल्दी आने लगे हो और मुझसे ठीक से बात भी नहीं कर रहे हो? क्या हुआ है?

"कुछ भी तो नहीं ... वो तो आजकल मेरा काम जल्दी हो जाता है इसलिए में जल्दी घर आ जाता हूँ और राजमहल के हिसाब किताब को लेकर थोड़ी चिंता है ... बस और कोई बात नहीं है" -सुलोचन ने कहा।

सुकुमार ने उसकी बात मान ली और भोजन करके सो गया।

सुलोचन मन ही मन सोचने लगा कि "मैं इसे कभी भी अपने धन के बारे में कुछ नहीं बताऊंगा।" नहीं तो ये मुझे कारागार में डलवा देगा।

सुलोचन को लगने लगा कि कोई उसके हिसाब किताब के बारे में कुछ कह भी दे तो क्या फर्क पड़ता है! क्योंकि राजा कुंवर सिंह मुझ पर बहुत भरोसा करते हैं, वो मुझे कुछ नहीं कहेंगे। इसलिए वह बिना भय के हमेशा कोई न कोई हेरा फेरी कर और अधिक धन जमा करने लगा।

एक दिन जब सुकुमार रात्रि के समय अपने घर लौट रहा था तो उसने मार्ग में राजदरबार के राजगुरु को देखा।सुकुमार ने उन्हें प्रणाम किया और अपना परिचय दिया।

सुकुमार का नाम सुनते ही राजगुरु ने कहा- मैंने तुम्हारे विषय में सुना है, महाराज कुंवर सिंह ने तुम्हारे द्वारा बनाये स्वादिष्ट भोजन के विषय में भी मुझको बताया है।

सुकुमार ने कहा कि गुरुदेव यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं अब आपको अपने घर भोजन पर आमन्त्रित करता हूँ। वैसे भी रात्रि बहुत हो गयी है।कल सुबह हम दोनों साथ में राजमहल चलेंगे।

राजगुरु ने कहा- ठीक है, आप उचित कहते हैं। आज आपके यहाँ भोजन कर रात्रि विश्राम करूँगा और कल सुबह ही राजमहल चलेंगे।

यह सुनकर सुकुमार बहुत खुश हुआ और बोला , "आपकी सेवा का असवर पाकर मैं धन्य हुआ।"

आइये गुरुदेव इस मार्ग…यह कहते हुए सुकुमार आगे आगे चलतगुरुदेव को दिशा बता रहा था।ठोड़ी देर में वह घर पहुँच गए।

सुकुमार ने सुलोचन को आवाज लगाई और उसे दरवाजे पर बुलाया।

ये महात्मा कौन है? मित्र! - सुलोचन ने पूछा।

सुकुमार ने दोनों का परिचय करवाया और गुरुदेव को सम्मान से घर में प्रवेश कराया और उचित स्थान पर बैठाया।

"धन्य भाग हमारा जो आप हमारे घर पधारे"- सुलोचन बोला।

सुलोचन ने गुरुदेव को स्वच्छ जल से मुंह हाथ धुलवाकर भोजन के लिए बैठाया और इतने में सुकुमार ने गुरुदेव के लिए शुद्ध शाकाहारी और स्वादिष्ट भोजन तैयार कर दिया।

गुरुदेव ने कहा- "भोजन से सुगंध बहुत अच्छी तरह से आ रही है, जिसने मेरी भूख को बढ़ा दिया है। इसलिए जल्दी भोजन परोसो।"

कुछ समय बाद सुकुमार ने गुरुदेव के लिए भोजन परोसा और कहा- "भोजन शुरू कीजिए गुरुदेव।"

गुरुदेव ने भोजन मंत्र कर भोजन करना शुरू किया और बीच-बीच में 'अति स्वादिष्ट' 'अति उत्तम' जैसी टिप्पणी करते हुए चटकार मारने लगे।

भोजन पूर्ण होने के बाद गुरुदेव ने हाथ धोये और कहा- वत्स! तुम्हारे भोजन से मेरा पेट और मन दोनों भर गया। आपको देने के लिए क्या ईनाम चाहिए।

"नहीं…! गुरुदेव ये सब मैंने ईनाम के लालच में नहीं किया , यह तो आपके प्रति मेरा प्रेम और श्रद्धा है।", सुकुमार ने हाथ जोड़कर कहा।

सुलोचन के मन में फिर लालच उठा उसने कहा, " हिचकिचाना क्यों मित्र! जब गुरुदेव अपनी इच्छा से तुम्हें कुछ देना ही चाहते हैं तो हमें उनका सम्मान करते हुए उनसे ईनाम ले लेना चाहिए।"

गुरुदेव ने सुकुमार को चार मिट्टी के दीपक दिए जिसमें एक निश्चित मात्रा में तेल डाला और कहा- वत्स ये आपकी सेवा का फल है।

" दीपकों को एक एक कर जलाकर पहले उत्तर दिशा में जाना और जिस स्थान पर जाकर यह बुझ जाए वहाँ पर आपको हजारों स्वर्ण मुद्राएँ प्राप्त होंगी। इसी प्रकार दूसरे दीपक को जलाकर पूर्व दिशा में जाना वहाँ आपको एक घड़ा सोने के आभूषणों का मिलेगा तीसरे दीपक को जलाकर दक्षिण दिशा में ले जाना वहाँ आपको हीरे मोती से भरे हुए कपड़े का थैला मिलेगा। चौथे दीपक को जलाकर यदि आप पश्चिम दिशा में जाओगे तो आपको एक महल पूरा का पूरा मिल जाएगा, लेकिन आप उसका उपभोग नहीं कर पाओगे बल्कि महल पाने के बाद पछताओगे।"

यह कहकर सुकुमार ने एक कमरे की ओर इशारा करते हुए विनम्रता से कहा, " गुरुदेव उस कक्ष में आपके लिए विश्राम का प्रबंध किया है।"

"शुभ रात्रि वत्स! " कहकर गुरुदेव शयनकक्ष में चले गए और सुकुमार भी वहाँ से अपने कक्ष में गए।

गुरुदेव द्वारा सुकुमार को चार दीपक दिए जाने वाली बात सुलोचन ने भाली भांति समझ ली।

वह पहले से लालची तो था ही यह बात सुनकर उसके मन में और अधिक धन एकत्र करने का विचार आया और उसने सोचा क्यों न सुकुमार से पहले में ही गुरुदेव के कहने के अनुसार सम्पूर्ण धन अकेले ही प्राप्त कर लूं।

इसी विचार के साथ वह भी सो गया।

अगले दिन प्रात: सुकुमार जब गुरुदेव के साथ राजमहल जा रहा था तो सुलोचन ने स्वास्थ्य खराब होने का बहाना बनाया और घर पर ही रुक गया।

अपना ख्याल रखना दोस्त! - यह कहकर सुकुमार और गुरुदेव राजमहल की ओ चल दिए।

सुलोचन मन ही मन प्रसन्न हुआ कि उसकी योजना सफल हुई। स्वास्थ्य खराब तो बहाना है वास्तव में मुझे तो खज़ाना एकत्र करना है।

(उन्होंने पहले ही सुकुमार को दीपकों को अपने कक्ष में रखते हुए देख लिया था और सुनिश्चित कर लिया था कि दीपकों का क्रम क्या है और उनका प्रयोग किस तरीके से करना चाहिए।)

सुलोचन सुकुमार के कक्ष में गया, वहां से प्रथम दीपक उठा और उसे जलाकर उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान किया और कुछ मील की दूरी पर वह बुझ गया। उसने उस जगह पर खुदाई की और उसे वहाँ दो मटके भर कर स्वर्ण मुद्राएँ प्राप्त हुईं।

यह देखकर उसकी आँखों में चमक आ गयी।

"गुरुदेव की कही गयी बात तो सत्य निकली, अब मैं बहुत अमीर बन जाऊँगा।" उसने मन ही मन कहा।

उसने दोनों मटके लिए और वापस घर आ गया।

रात भी होने वाली थी उसने जल्दी से उन मटकों को भी उसी जगह छिपा लिया जहां उसने पहले ही महल से कुछ धन चोरी छिपे लाकर छिपा रखा था और दीपक में थोड़ा तेल डालकर उसे भी सुकुमार के कमरे में रख दिया गया ताकि उसे शक ना हो।

थोड़ी देर में सुकुमार घर पहुंच गए।जब वह अपने कमरे में गए तो उसे लगा कि पहले दीपक को किसी ने जलाया है।

"कहीं ... सुलोचन तो नहीं ...! नहीं नहीं वे ये सब क्यों करेंगे। वैसे भी उनका स्वास्थ्य खराब है। लगता है मुझे कोई गलतफहमी हो गयी है।" यह सोचकर वह खाना खा कर सो जाता है।

अगले दो दिन फिर बीमारी का बहाना कर सुलोचन घर पर ही रुका और एक दिन दूसरे और अगले दिन तीसरे को एक एक कर पूर्व और दक्षिण दिशा में गया।

गुरुदेव की वाणी फिर सत्य निकली उसे पूर्व दिशा में एक सोने से बने आभूषणों का घड़ा मिला और दक्षिण दिशा में हीरे मोती का एक बड़ा घड़ा।वह यह सोचकर बहुत प्रसन्न हुआ कि वह अब राज्य में सबसे अमीर व्यक्ति बन जाएगा।

उसने सोने के आभूषणों का घड़ा और हीरे मोती को अपने घर में छिपा दिया।

अब सुकुमार भी राजमहल से घर लौट गया था उसने आते ही सुलोचन का हाल ही पूछा और अपने कमरे में चला गया।उसे अब की बार सुकुमार पर पक्का शक हो गया था कि सुलोचन ने पहले उन दीपकों को जलाकर गुरुदेव के कहने के अनुसार धन प्राप्त कर लिया है और मुझे पता न चले इसलिए उस धन को कहीं छिपा लिया है।

सुकुमार ने सोचा कि अगर सुलोचन ने अपने लोभ में तीन दीपकों का उपयोग कर लिया है तो वह चौथे का उपयोग भी निश्चित रूप से करेगा।

एक दिन जब सुलोचन ने फिर एक बहाने से घर पर ही रुकने का फैसला लिया तब सुकुमार घर से राजमहल जा रहा हूँ कह के निकल तो गया लेकिन घर के बाहर छिपकर सुलोचन पर नज़र रखने लगा। उस दिन उसने फिर चौथे दीपक को जलाकर बाहर देखा और पश्चिम दिशा की ओर चल दिया।

सुकुमार का शक सही निकला और उन्होंने उसका पीछा करने लगा।

चलते चलते एक पुराने मकान के दरवाजे पर जाकर दीपक बुझ गया।सुलोचन को समझ आ गया कि इस मकान के अंदर मुझे और अधिक धन मिलेगा।

वह अंदर जाने से पहले थोड़ा सा हिचकिचाया क्योंकि उसे गुरुदेव के वचन याद आए कि इस महल को प्राप्त तो कर लोगे लेकिन इसका उपभोग नहीं कर पाओगे बल्कि इसे पाने के बाद पछताओगे।

लालच में अंधा होकर वह अंदर चला गया। वह स्थान राजा के महल से भी अधिक सुंदर और आलीशान था। राजा की बड़ी सोने की मूर्ति भी उस स्थान के एक पत्थर का मुकाबला नहीं कर सकती थी। सोलाचन ने सोचा अगर यह मेरा हो गया तो मैं विश्व का सबसे अमीर और ताकतवर व्यक्ति बन सकता हूं।

तभी उसने देखा कि उस मकान के अंदर उसके सामने एक व्यक्ति एक पहिये को अपने हाथों से घुमा रहा है। और जैसे जैसे वह पहिए को घुमाता उस स्थान की सुन्दरता बढ़ती जाती और धन और भी बढ़ने लगता। 

उस व्यक्ति ने कहा मेरी मदद करो भाई! इस पहिये को घुमाने में मेरी सहायता करो। 

लालच में अंधा सुलोचन तुरन्त वहाँ गया और उस व्यक्ति को वहाँ से हटाकर स्वयं पहिया घुमाने लगा।

तब वह व्यक्ति द्वार पर जाकर कहता है- लो भाई..लो। जितना चाहिए उतना धन प्राप्त कर लो लेकिन मैं तुमको एक बात बता दूं अगर यह पहिया घूमना बन्द हुआ तो यह मकान ढह जाएगा और तुम्हारी इस मकान के नीचे दबकर मृत्यु हो जाएगी।

मैं एक चोर हूँ मुझको तो यहाँ से छुटकारा मिल गया ! यह कहकर उस व्यक्ति ने थोड़ा बहुत धन लिया और वहाँ से भाग गया।

सुलोचन को बोध हुआ कि यह स्थान राज्य का एक जादुई स्थान है जिसे लोभियों को सजा देने के लिए बनाया गया है।

इतने में सुकुमार आया उसे देखकर सुलोचन ने रोते हुए सुकुमार से मदद मांगी। .सुकुमार ने कहा मित्र मैंने तुम्हारी और उस बात की बात सुन ली।

आज तुम्हारी यह हालत उस चोर के कारण नहीं हुई बल्कि तुम्हारे लालच के कारण हुई है। तुमने गुरुदेव के कहे अनुसार धन तो एकत्र कर लिया लेकिन उनकी चेतावनी को अनसुना किया ; मुझे खेद है कि मैं तुम्हारा मित्र था। अब भुगतो !!

यह कहकर सुकुमार भी वहाँ से चला गया और घर में सुलोचन ने जो भी धन दौलत छुपाई थी। उसे ढूंढकर राजमहल के खजाने में जमा करवा दिया।

दरअसल गुरुदेव को सुलोचन के बारे में पहले ही सब कुछ पता चल गया था। इसलिए उन्होंने चार दीपकों के माध्यम से उसे चार मौके दिए ताकि उसका लालच खत्म हो लेकिन उसने ऐसा नहीं किया और उसका अंत बुरा हुआ।

आखिर गुरुदेव की बात सत्य हुई !!!




यह भी पढ़ें -



Post a Comment

Previous Post Next Post