Moral Story In Hindi For Class 5


एक बार की बात है। सीतापुर नाम का एक गाँव जो कि यमुना नदी के किनारे बसा था। इसी गाँव से अलग नदी के किनारे सुरेश नाम का व्यक्ति अपनी पत्नी रमा और अपने दो पुत्रों के साथ रहता था।

वह एक दलित परिवार था इसलिये उसे धन प्राप्त करने के लिए गाँव के धनी साहुकारो के खेतों में मजदूरी करनी पड़ती थी।वह दिन भर काम करता और तब जाकर शाम को अपने परिवार के भोजन को जुटा पाता था।
Moral story in hindi for class 5
Moral story in hindi for class 5


अब बरसात का समय आ चुका था, यमुना नदी का पानी उफान पर था। चारों ओर बाढ़ की हालात पैदा हो रहे थे।

 एक दिन अचानक यमुना नदी का पानी किनारे में घुस गया और सुरेश की कुटिया को बहा ले गया,लेकिन अच्छी बात यह थी कि सुरेश या उसके परिवार वालों में से किसी को कोई नुकसान नहीं हुआ।
 साथ सी साथ एक समस्या भी आ गई थी सुरेश का परिवार बेघर हो गया उनके पास खाने के नाम पर अनाज का दाना तक नहीं था।

 सुरेश और उसकी पत्नी रमा अपने बच्चों के साथ नदी के किनारे बैठते हुए अपनी परेशानियों से निजात पाने के बारे में सोच रहे थे।

सुरेश ने सुझाव दिया कि वह गाँव के साहूकारों से उनकी मदद करने की प्रार्थना करेगा और शायद वो मेरी मदद के लिए मान भी जायेंगे, इसलिए वह इसी आशा के साथ साहूकारों के पास जाता है लेकिन कोई भी उसकी सहायता के लिए आगे नहीं आया।

 वह निराश होकर अपने परिवार के पास वापस जाता है। रमा उसके उदास चेहरे को देखते ही पहचान जाती है कि साहूकारों ने अवश्य मदद का हाथ नही बढ़ाया होगा।

सुरेश, रमा को सारी बात बता देता है कि कैसे किसी भी साहूकार ने उसकी विनती को नहीं माना और उसकी मदद नहीं की।

साहूकारों से मिली निराशा से रमा को एक रास्ता सूझा उसने सुरेश को कहा कि अब तो केवल उसके पिता ही उनकी मदद कर सकते हैं।

लेकिन रमा के पिता उससे अधिक स्नेह नहीं करते थे क्योंकि वह एक लड़की थी और उनको अपना पुत्र अधिक प्यारा था। रमा और सुरेश के पास उसके पिताजी की सहायता लेने के आलावा कोई विकल्प नहीं था।

 रमा के पिताजी सितारगढ़ में रहते थे ।सुरेश ने रमा से कहा- “तुम पुत्रों को  लेकर सितारगढ़ चली जाओ और तब तक मैं रहने के लिए कुटिया बनाने की कोशिश करता हूँ”।

रमा सितारगढ़ पहुँचने वाली ही थी कि अचानक रास्ते में उसने एक बाघ को देखा जो शिकार की फिराक में घात लागाकर झाड़ियों में छिपा था। रमा ने तुरंत अपने पुत्रों को अपनी पीठ पीछे छुपाने की कोशिश की ताकि बाघ के हमले से वे दोनों बच सकें।


रमा बाघ से छुटकारा पाने के बारे में सोच ही रही थी कि एकाएक उसके दिमाग में एक तरकीब आई उसने अपने पुत्रों को अपनी योजना के बारे में बताया ।

अचानक रमा उनको मारने लगी और जोर-जोर से कहने लगी कि में तुमको बाघ का ताज़ा मांस कहाँ से लाकर दूँ।तुमको आधे घंटे पहले तो एक बाघ का भोजन करवाया था अब फिर से एक और कहाँ से लाकर दूँ।

दोनों बेटे अपनी माँ की योजनानुसार जोर- जोर से चिल्लाकर एक और बाघ खाने की जिद करने लगे।
बाघ चुप चाप सुन रहा था , उसको लगा कि यह साधारण लोग नहीं हैं जिन्हें मैं अपना भोजन बना सकूं बल्कि ये लोग तो मुझे ही अपना भोजन बनाने पर तुले हुए हैं।

 यह सब कुछ देखकर बाघ डर गया और  झाड़ियो से निकलकर अपनी गुफा की ओर भागने लगा। वह सोचता रहा की ये आखिर है कौन जो बाघ को खाने की इच्छा रखते हैं ?

गुफा में लोमड़ी बाघ का इंतजार कर रही थी कि कब बाघ शिकार को लेकर आये और उसे कुछ खाने को मिल जाये। तभी उसने बाघ के आने की आहट सुनी लेकिन जैसे ही बाघ सामने आया तो लोमड़ी ने देखा कि उसके पास कुछ नहीं था।

 लोमड़ी ने पूछा, आज कुछ नहीं लाये , आपका शिकार कहाँ है?
 बाघ ने लोमड़ी को बताया कि जंगल में एक बाघ को खाने वाला परिवार रह रहा है ।मैं तो उनसे अपनी जान बचाकर आया हूँ वो बड़े खतरनाक इंसान हैं जो हर एक घंटे मै एक बाघ का शिकार कर भोजन करते हैं ।

लोमड़ी हंसकर बोली - "मुझे पता है ,तुमको आज कोई बड़ा शिकार मिला है जिसे तुम मेरे साथ नहीं बाँटना चाहते हो इसलिये ये सब कहानी बना रहे हो।

 बाघ ने लोमड़ी की ओर गुस्से से  देखा और कहा - "मैं तुमसे झूठ क्यों बोलूँगा मैंने तो हमेशा तुम्हें अपना शिकार खाने को दिया है।"

“मै तुम्हारा विश्वास कैसे कर लूँ?" –लोमड़ी ने पूछा,
"भला कैसे कोई मनुष्य किसी जंगली जानवर वो भी बाघ को अपना भोजन बना सकता है मुझे उस जगह ले चलो जहां पर वो परिवार है।"

बाघ ने कहा - नहीं! नहीं! मैं तुम्हें वहाँ नही ले जाऊंगा कहीं उन्होंने मुझे देख लिया तो  वो तो मुझे मार डालेंगे और तुम तो अपनी जान बचाकर भाग जाओगी

मै भला ऐसा क्यों करूंगी । यदि आपको मुझ पर विश्वास नहीं है तो आप मुझे अपने साथ बांध लो तब दोनों एक साथ रहेंगे – लोमड़ी बोली ।

बाघ ने ऐसा ही किया और दोनों एक साथ जंगल के उसी भाग में चले गये जहां पर वह महिला अपने पुत्रों के साथ थी लेकिन इस बार वो वहां पर नही थे बाघ उनकी गंध सूंघते हुए उन तक पहुंच ही गया।

रमा उस वक्त अपने पुत्रों के साथ आराम कर रही थी, किसी के आने की आहट सुनी और ध्यान से देखने पर उसको पता चला कि इस बार फिर बाघ उनका पीछा कर रहा है और उसके साथ में एक लोमड़ी भी है।

रमा अपनी जगह से उठी और जाने ही वाली थी कि बाघ और लोमड़ी झाड़ी से बाहर आये।

रमा हंसी और लोमड़ी की और देखते हुए बोली-“वाह लोमड़ी! इसबार तो तू बहुत हट्टा कट्टा बाघ लायी है हमारे शिकार के लिए,पिछली बार वाला तो कमजोर था उसका मांस भी अच्छा नहीं था ये वाला बहुत बढ़िया है।

ये सब सुनते ही बाघ को लगा कि लोमड़ी भी इन लोगों से मिली हुई है और मुझको इनका भोजन बनाना चाहती है।

बाघ ने सोचा कि लोमड़ी ने इसलिए मुझे बांधा है ताकि मैं भाग ना सकूं उसे लोमड़ी पर बहुत गुस्सा आया साथ ही साथ वह रमा और उसके पुत्रों से भी डर रहा था।

बाघ ने अपनी पूरी ताकत लगा दी और भागने लगा।उससे बंधी लोमड़ी ने उसे समझाने का प्रयास किया।

 लेकिन बाघ लगातार भागता रहा उसके साथ बंधी लोमड़ी घिसकते हुए उसके साथ चल रही थी इस कारण लोमड़ी कुछ दूर चलने के बाद थककर गिर गई
और घिसटने से उसकी मौत हो गई।

बाघ खुश था कि उसकी जान बच गई और धोखेबाज लोमड़ी भी मारी गई और उस दिन बाघ ने उसी को खाकर अपना भोजन किया ।

उधर रमा भी अपने पिताजी के घर कुशलता से पहुंच गई। रमा के पुत्रों ने बाघ का किस्सा अपने नानाजी यानी रमा के पिताजी को सुनाया । रमा के पिताजी उससे बहुत खुश हुए और रमा के पिता को रमा के साहस की तारीफ़ की ।

रमा ने अपनी परेशानियों के बारे में भी अपने पिता को बताया। रमा के पिता ने उसकी मदद के पैसे निकालर उसके गाँव गये और उनका नया और पक्का घर भी बनवाया।

अब फिर से रमा और उसका पति सुरेश एक खुशहाल जीवन बिताने लगे।

कहानी से प्राप्त मुख्य बिंदु
1.  समाज में अधिकतर पुरुषों को ही समझदार और बुद्धिमान माना जाता है इसलिए उन्हें स्त्री की अपेक्षा श्रेष्ठ समझकर स्त्रियों का आदर नहीं होता।

 जबकि वास्तविक्ता यह है कि स्त्रियां भी पुरुषों के समान ही सम्मान की हकदार होती हैं।

जैसा कि रमा के पिता रमा को उपेक्षित समझते थे लेकिन वह समझदारी से काम करती थी और इसी के प्रयोग से उसने अपनी और अपने पुत्रों की रक्षा की।

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