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Moral Stories In Hindi For Class 8


नमस्कार दोस्तों स्वागत है आप सभी का kahanistation पर और आज हम लेकर आए हैं तीन बहुत हूं अच्छी और प्रेरणादाई Moral Stories जिन्हें पढ़कर आपको मनोरंजन के साथ साथ सीखने को भी मिलेगा तो चलिए शुरू करते हैं।


गुरु की महिमा Moral Stories In Hindi For Class 8

गुरु की महिमा Moral Stories In Hindi For Class 8
गुरु की महिमा Moral Stories In Hindi For Class 8


 

बलवंत सिंह एक अखाड़े के मालिक थे , जहां वे नए लड़कों को कुश्ती की ट्रेनिंग देते थे ।

बलवंत सिंह खुद एक बहुत बड़े पहलवान थे और कई प्रतियोगिताओं में विजई हुए। रिटायर होने के बाद वे अब कुश्ती सिखाते थे।

बलवंत सिंह पहलवान होने के अलावा एक ईमानदार और बहुत अच्छे इंसान थे जो लोगों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते थे। इस वजह से भी वे सभी के पसंदीदा थे।

शहर में उनके अखाड़े से मुकाबले में किसी भी दूसरे अखाड़े के पहलवान नहीं टिक सकते थे ; इसलिए हर कोई उन्हीं के अखाड़े से सीखना चाहता था। 

यही एक कारण था कि शहर के दूसरे अखाड़ों के मालिक और बड़े बड़े व्यापारी उनसे जलते थे और उनको नीचे गिराने के लिए तरह तरह के हथकंडे अपनाते थे।

 उन्हीं लोगों में से कांतिलाल एक था वह बहुत पैसे वाला व्यक्ति था लेकिन उसका धंधा बलवंत सिंह की वजह से कुछ खास नहीं चल रहा था।

एक दिन उनके अखाड़े में एक लड़का राकेश आया , उसके पिता बलवंत सिंह के अच्छे दोस्त थे। राकेश के कुश्ती में बहुत खराब प्रदर्शन होने के कारण उसके पिता दुःखी थे।

 राकेश के पिता उसे बड़ा पहलवान बनता देखना चाहते थे ,लेकिन राकेश के पास अच्छा गुरु नहीं था क्योंकि उसके पिता बहुत बूढ़े हो चुके थे।

अब उनकी अंतिम इक्षा ही यही थी इसलिए उन्होंने अपनी अंतिम सांस से पहले राकेश को बलवंत सिंह के पास जाने को कहा।

बलवंत सिंह अपने दोस्त की मौत से दुखी हुए और राकेश को सिखाने के लिए भी तैयार हो गए।

6 महीने की कड़ी मेहनत के बाद राकेश एक दमदार पहलवान बन चुका था ; और अब वह दूसरे अखाड़ों के पहलवानों से लड़ने के लिए भी तैयार हो चुका था।

वार्षिक कुश्ती प्रतियोगिता में बलवंत सिंह के अखाड़े से राकेश ने नेतृत्व किया और सभी दूसरे पहलवानों को चित कर दिया।

राकेश ने बलवंत सिंह के अखाड़े को और भी अधिक प्रसिद्धि और सम्मान दिलाया। लोग राकेश में बलवंत सिंह की परछाई देखते थे।

धीरे धीरे समय बीतता गया और अखाड़े से ज्यादा राकेश प्रसिद्ध हो गया।अब राकेश के व्यक्तित्व में घमंड की झलक दिखाई देती थी।

 अब जब राकेश शहर के सारे नामी पहलवानों को चित कर चुका था तो उसका घमंड और बढ़ गया। राकेश की शिकायतें अक्सर बलवंत सिंह के पास आने लगी ; लेकिन राकेश उनका चहीता होने के कारण वे उसे कुछ कह नहीं सकते थे।

एक साल बाद जब फिर से वार्षिक कुश्ती प्रतियोगिता आयोजित हुई तो बलवंत सिंह ने राकेश से प्रतियोगिता में जाने को कहा।

राकेश ने अंगड़ाई लेते हुए बलवंत सिंह से कहा - " गुरुजी ! इन छोटी मोटी कुश्तियों से लड़ने के लिए मैं नहीं बना हूं। मैं बड़ी कुश्ती ही लड़ूंगा।"

बलवंत सिंह के दिल को बहुत ठेस पहुंची क्योंकि वे राकेश को अपने बेटे से भी अधिक चाहते थे और बदले में राकेश ने उन्हें सम्मान भी नहीं दिया।

अत: बलवंत सिंह ने अपने बेटे अर्जुन को ही प्रतियोगिता में भेज दिया। प्रतियोगिता में अर्जुन ने बहुत अच्छा प्रदर्शन दिखाया। 

और पहले दो मुकाबले जीत लिए ।

अब मुकाबला कांतिलाल व्यापारी के पहलवान के साथ था। जब पहलवानों की घोषणा हुई तो बलवंत सिंह यह सुनकर चौंक गए किए कांतिलाल ने राकेश को पहलवान के रूप में उतारा है।

राकेश ने आसानी से अर्जुन को हरा दिया। बलवंत सिंह के अखाड़े की बहुत बदनामी हुई कि इनका पहलवान इनको ही धोखा दे गया।

बलवंत सिंह को पता चला कि कांतिलाल ने उसे 10 लाख रुपए और अपने अखाड़े का अध्यक्ष बनने का लालच देकर उसे अपनी तरफ कर लिया था।

कांतिलाल ने राकेश को 1 लाख रुपए और अखाड़े के कागज पहले ही दे दिए थे। अब राकेश और रुपयों का इंतज़ार कर रहा था तभी उसके दरवाजे पर किसी ने आवाज़ दी वह खुश हुआ कि रुपए आ गए।

जब उसने दरवाजा खोला तो दरोगा और 2 हवलदार सामने थे ; उन्होंने घर की तलाशी लेनी शुरू कर दी।

कुछ समय बाद हवलदारों को रुपए और कागज मिले तो उन्होंने राकेश को पकड़ लिया।

राकेश कुछ ना समझ पाया लेकिन जब वह थाने पहुंचा तो उसे मालूम हुआ कि कांतिलाल ने पुलिस में उसकी शिकायत दर्ज की है कि राकेश ने उसके घर से 1 लाख रुपए और अखाड़े के कागज चुराए हैं।

राकेश को जेल में डाल दिया गया। 

जब बलवंत सिंह को बात पता चली तो वह खुद को रोक ना पाए और राकेश को छुड़ाने चले गए।

राकेश बहुत शर्मिंदा था। वह अपने गुरु से नजरें भी नहीं मिला पा रहा था। फिर बलवंत सिंह ने उसे समझाया तू चाहे कितना भी भटक जाए लेकिन मैं तेरा गुरु हूं और ये मेरा उत्तरदायित्व है कि मैं तुझे सही रास्ता दिखाऊं।

चोरी का मालमा जब अदालत में गया तो यह बात साफ हो गई कि कांतिलाल ने ही राकेश को फंसाया है।कांतिलाल को चार सौ बीसी के जुर्म में जेल हो गई।

राकेश ने दुबारा से बलवंत सिंह के अखाड़े में सिखाना शुरू कर दिया।

कहानी से सीख -

गुरु हमेशा पूजनीय होते हैं। कभी अपने गुरु की अवहेलना नहीं करनी चाहिए अन्यथा परिणाम हानिकारक सिद्ध हो सकते हैं।


बेईमानी का नतीजा Moral Stories In Hindi For Class 8

बेईमानी का नतीजा Moral Stories In Hindi For Class 8
बेईमानी का नतीजा Moral Stories In Hindi For Class 8


 यह कहानी है मोतिहारी गांव की जो बहुत छोटा तो नहीं था लेकिन रहने के नाम पर केवल 25 परिवार रहते थे। उन्ही में से एक छोटा सा परिवार था सुधाकर का, उसके परिवार में उसकी पत्नी एक लड़का और एक लड़की थी।

उसके पास गांव में खेती कम थी लेकिन उसके पास 5 दुधारू गायें थी।

उसकी गायें एक दिन में लगभग 18 लीटर दूध देती थी।

उसमें से वो लगभग 10 लीटर गांव में बेचता था और बाकी अपने पास ही रखता था।

दूध बेचकर वह जितना कमाता उससे उसका महीने भर का घर का खर्च निकल जाता था,क्योंकि अभी उसके बच्चे भी छोटे थे और उनकी आवश्यकताएँ  भी कम ही थी।

वह अपने छोटे से परिवार के साथ बहुत खुश था । 

अब जैसे जैसे समय बीतता गया और उसके बच्चे भी बड़े होने लगे तो वह उनके भविष्य को लेकर बहुत चिंतित रहने लगा। 

वह बच्चों को पढ़ाना चाहता था लेकिन उनके कपड़ों और किताबों का खर्चा अधिक था और उसकी घर की कमाई बहुत कम।

 एक दिन गांव की पाठ शाला के मास्टर सुरेंद्र जी उनके घर आये। सुधाकर ने उनको आदरपूर्वक चारपाई पर बैठाया और गौशाला में काम कर रही अपनी पत्नी को आवाज लगाई - "अरे सुनती हो ! देखो हमारे यहाँ मास्टर जी आये हैं जल्दी से अंदर आओ।"

 उसकी पत्नी हाथ धोकर घर की रसोई में प्रवेश करती है और मास्टर जी के लिये चाय बनाती है।

 मास्टर जी सुधाकर से कहते हैं - "मेरा यहां आने का कुछ कारण है।"

"क्या कारण है मास्टर जी? " - सुधाकर बोला।

मास्टर जी बोले - " देखो भाई आपके बच्चे अब बड़े हो गए है उनको अब विद्यालय भेजना चाहिए ताकि वो भी अपना भविष्य सुधार सकें।"

मास्टर जी की बात पर सहमति जताते हुए सुधाकर कहता है - " मैं भी उनको विद्यालय भेजना चाहता हूं लेकिन मैं उतना कमा ही नहीं पाता जिससे कि मैं उनकी सारी जरूरतें पूरा कर सकूँ।"

मास्टर जी कहते हैं - "मैं तुम्हें एक सुझाव दे सकता हूँ....क्यों न तुम अपने गायों का दूध शहर में जाकर बेचो इससे तुम्हे बहुत लाभ होगा।"

उसी वक़्त सुधाकर की पत्नी भी चाय लेकर आई और मास्टर जी के सुझाव  पर हामी भर दी।

सुधाकर भी इस सुझाव को मान गया।

सायंकाल के समय जिन गांव वालों को वह दूध देता था उनको अपनी परेशानी के बारे में बताया और उनसे शहर में दूध बेचने की बात भी बताई।सभी ने सुधाकर की बात को मान लिया।

अगले दिन वह शहर गया और देखा कि किस दुकान में सबसे ज्यादा भीड़ है। ऐसी ही एक दुकान उसकी नज़रों में आ गयी दुकान के बाहर लिखा था "जयंती डेरी और जनरल स्टोर"

सुधाकर उस दुकान में गया। जयंती भाई ने पुछा , " हाँ भाई! क्या चाहिए ? "

सुधाकर बोला - " नहीं भाईसाहब! मुझको कुछ नहीं चाहिए मैं तो आपसे सौदा करने आया हूँ।"

"सौदा ? सौदा किस चीज का?पहले अपना परिचय तो दो! " दुकानदार ने पूछा।

सुधाकर ने अपना परिचय जयंती भाई को दिया और बोला - " मैं आपकी दुकान में दूध बेचना चाहता हूँ रोज का 10 लीटर ! "

दुकानदार इस बात को मान गया और दूध का मूल्य भी नियत कर लिया।सुधाकर भाई में तुमसे दूध 25 रुपये लीटर खरीदूँगा।

उस हिसाब से महीने के कितने हुए भाई सुधाकर पूछा।

उस हिसाब से महीने के पूरे 7,500 रुपये।

ये सुनकर सुधाकर खुश हो गया और सौदा पक्का कर के अपने घर चला गया।

घर जाकर अपनी पत्नी को यह बात बताई तो वह भी खुश हो गयी।

"अब हम अपने बच्चों को विद्यालय भेज पाएंगे " सुधाकर ने राहत की सांस लेकर कहा।

अगले दिन पहले उसने 5 लीटर दूध गांव में बेचा फिर 10 लीटर दूध लेकर शहर आया और जयंती भाई की दुकान में दूध रख लिया।

अब हमेशा का यही था।सुधाकर होने वाले मुनाफे से बहुत खुश था। जयंती भाई भी सुधाकर के दूध की गुणवत्ता देख कर बहुत खुश था क्योंकि उससे उसकी ग्राहकी बढ़ गयी थी।

लगभग तीन चार महीने तक यही चलता रहा।सुधाकर ने अपने दोनों बच्चों का दाखिला भी करवा दिया था।

एक दिन सुधाकर सामने से बोला- " जयंती भाई!  मैं जो दूध लाता हूँ उसकी गुणवत्ता बहुत बढ़िया है। क्यों न ऐसा किया जाय कि मैं अब 4 किलो पनीर भी आपकी दुकान में हर दिन बेचूँ।"

जयंती भाई के मन में इस बार थोड़ा लालच आया उसने सोचा क्यों न इससे थोड़ा और मुनाफा कमाया जाए, और उसने इस सुझाव को मान लिया। साथ ही कहा कि अब तुम केवल 6 लीटर दूध लाना और 4 किलो पनीर लाना। पनीर का मूल्य 150 रुपये किलो दूँगा।

सुधाकर भी मान गया।उसने उस दिन वहाँ से 1 किलो चीनी खरीदी।

अब अगले दिन से वह हमेशा 6लीटर दूध और 4किलो पनीर जयंती भी की दुकान पर लाने लगा।

महीने के अंतिम दिन जयंती भाई उसे रुपये देता था।

सुधाकर भी बहुत खुश था।

एक दिन जयंती भाई ने पानीर का वजन देखा तो वो केवल 3किलो 600 ग्राम की थी।

यह देखकर वह बहुत गुस्सा हुआ और बोला, " वो गांव वाला है मगर मुझको चूना लगा रहा था इतने दिनों से ! आने दो उसे कल मैं उसे अपनी दुकान में घुसने नहीं दूँगा ! "

अगले दिन जैसे ही सुधाकर दुकान में प्रवेश करने वाला था जयंती भाई ने उसे रोका और जोर से कहा, "खबरदार! मेरी दुकान में आने की हिम्मत की ।अरे मैंने तेरी हालत पर तरस खाकर तुझे अपने साथ काम करने का मौका दिया और तूने तो जिस थाली में खाया उसी में छेद कर दिया! "

सुधाकर कुछ समझ नहीं पाया और पूछने लगा - " क्या हुआ भाई मुझसे कोई गलती हो गयी क्या?"

जयंती भाई ने कहा - " गलती नहीं ; धोखा दिया है तूने मुझको"

पास की दुकान वाला यह शोर सुनकर वहां आया और सारी बात जान ली।

जयंती भाई ने भी बता दिया कि ये जो पनीर ला रहा है वो केवल 3किलो 600 ग्राम है जबकि हमारी बात पूरी 4किलो पनीर की हुई थी।ये तो पूरे 400 ग्राम कम ला रहा है।मुझको तो बहुत घाटा हो गया।

दूसरा दुकान वाला शांत स्वभाव वाला था उसने सुधाकर से पूछा क्यों भाई आपने ऐसा क्यों किया? मैं तो तुम्हें ईमानदार समझ रहा था।

सुधाकर ने कहा, " ऐसा कुछ नहीं है भाई। जयंती भाई मैंने आपको धोखा नहीं दिया है।मेरे घर में तराजू तो है लेकिन उसके वाट नही हैं इसलिए में जो 1किलो हमेशा आपकी दुकान से खरीदता हूँ उसी से एक एक किलो पनीर तौल कर लाता हूँ।

जयंती भाई समझ गया और बहुत शर्मिंदा हुआ।

दूसरे दुकान वाले ने कहा देख लिया भाई सुधाकर भले गरीब है लेकिन अपना काम ईमानदारी से करता है धोखा तो तुम उसके साथ कर रहे हो पानीर जो बाजार में 200 रुपये किलो बिकता है तुम उसे सुधाकर से केवल 150रुपये किलो लेते हो।और तो और चीनी खुद तुमने 900 ग्राम दी फिर भी तुम सुधाकर को बेईमान कह रहे हो।

इस प्रकार शर्मिंदा होकर जयंती भाई ने सुधाकर से माफी मांग ली और उनका धंधा फिर से शुरू हो गया। अब कभी जयंती भाई ने सुधाकर को ठगने का प्रयास नहीं किया।

कहानी से सीख - 

कभी भी बेईमानी और झूठ का सहारा मत लो। कहते हैं झूठ के पैर नहीं होते वह ज्यादा देर चल नहीं सकता। इसलिए हमेशा अपने काम में ईमानदारी और सच्चाई को अपनाओ तभी काम सफल हो पाएगा।

 

प्रेरणा का स्रोत Moral Stories In Hindi For Class 8

प्रेरणा का स्रोत Moral Stories In Hindi For Class 8
प्रेरणा का स्रोत Moral Stories In Hindi For Class 8



 बहुत साल पहले एक गांव में कृष्णा नाम का लड़का रहता था। उसे क्रिकेट खेलने का बहुत शौक था।

 वह हमेशा से एक महान क्रिकेटर बनना चाहता था ; किंतु गांव में सुविधाएं उपलब्ध ना होने के कारण वह क्रिकेट की ट्रेनिंग नहीं ले पा रहा था।

क्रिकेट की ट्रेनिंग लेने के लिए वह गांव से शहर गया। उसने क्रिकेट की प्रैक्टिस करने के लिए एकेडमी को ज्वाइन किया और वह निरंतर प्रैक्टिस करता और स्वयं को अच्छे से अच्छा खिलाड़ी बनाने का प्रयास करता था ।

जब भी वो प्रैक्टिस करता था उसके पिताजी मैदान के किनारे एक बेंच पर बैठकर  उसकी प्रैक्टिस देखा करते थे लेकिन वह बालक कभी भी एकेडमी की क्रिकेट टीम में शामिल नहीं हो सका।

 इसके पश्चात शहर के क्रिकेट टूर्नामेंट के मैच शुरू हो गए जहां पर उसके एकेडमी के बच्चे भी भाग लेने जा रहे थे वह भी टूर्नामेंट में खेलना चाहता था ।

परंतु उसे टीम में स्थान नहीं दिया गया लेकिन  टूर्नामेंट के दौरान किसी एक खिलाड़ी के चोटिल होने के कारण उसे रिजर्व खिलाड़ी के तौर पर टीम में शामिल कर लिया गया ।

टूर्नामेंट के मैचों में उसे खेलने का मौका नहीं दिया गया क्योंकि उसकी एकेडमी की टीम बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रही थी और इसी कारण उसे टीम में जगह नहीं मिल रही थी।

 अगले दिन से टूर्नामेंट के क्वार्टर फाइनल तथा सेमीफाइनल मैच शुरू होने वाले थे परन्तु अचानक ही उस लड़के ने प्रैक्टिस पर आना बंद कर दिया।

 उसकी टीम क्वार्टर फाइनल का मैच जीत चुकी थी और अगले दिन टीम का सेमीफाइनल मैच था परंतु वह लड़का फिर भी प्रेक्टिस करने के लिए नहीं आया और इसी प्रकार उनकी टीम सेमीफाइनल का मैच भी जीत गई और फाइनल में प्रवेश कर गई ।

 अंततः वह लड़का फाइनल मैच के दिन प्रेक्टिस करने के लिए आया अगले दिन फाइनल मैच के शुरू होने से पहले वह लड़का अपने कोच के पास गया और उनसे फाइनल मैच में खेलने देने की  इजाजत मांगने लगा।

 उसकी बात सुनकर उसके कोच ने कहा - 

 "बेटा! मुझे दुख है कि मैं तुम्हें यह मौका नहीं दे सकता हूं क्योंकि हमारी टीम में अच्छे प्लेयर पहले से ही मौजूद हैं और हमारी टीम इन प्लेयर के साथ ही बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रही है साथ ही यह कोई सामान्य मैच नहीं है यह टूर्नामेंट का फाइनल मैच है और मैं तुम्हें  खेलने देने की इजाजत देकर खतरा मोल नहीं ले सकता हूं और इसके साथ-साथ हमारी एकेडमी की इज्जत भी दांव पर लगी है और जिसके कारण हमें यह फाइनल मैच जीतना ही होगा ।अतः मैं तुम्हें इस मैच में खेलने का मौका नहीं दे पाऊंगा।"

 लड़के ने कोच से कहा - " कोच!  मैं आपसे वादा करता हूं कि मैं आपका विश्वास नहीं तोडूंगा बस मैं इस मैच में खेलना चाहता हूं कृपया मुझे इस मैच में खेलने की इजाजत दे दीजिए।"

 इस प्रकार कई बार मिन्नतें करने के बाद कोच ने लड़के को खेलने की इजाजत दे दी परंतु साथ में उसे हिदायत भी दी - " बच्चे !मैं तुम्हें खेलने की इजाजत तो दे रहा हूं परंतु यह याद रखना कि यह फाइनल मैच है और मुझे अपने इस निर्णय के लिए शर्मिंदा ना होना पड़े।"

 लड़का यह सुनकर बहुत ज्यादा खुश हुआ और वह भागकर अपने टीममेट के पास गया और साथ में कुछ से यह भी इजाजत ले ली कि उसे आज पारी को शुरू करने दिया जाए ।लड़के का स्वयं पर विश्वास देखकर  कोच अत्यधिक प्रसन्न हुए और उन्होंने लड़के को पारी को शुरू करने की इजाजत दे दी।                 

फिर खेल शुरू हुआ और लड़का तूफान की तरह खेला उस दिन उसने अपने खेल के दम पर ही अपनी टीम को जीत दिला दी अपनी टीम के लिए उस मैच का हीरो बन गया इस प्रकार उसकी एकेडमी की टीम टूर्नामेंट को जीत गई।

 मैच खत्म होने के बाद कृष्णा के कोच बहुत ज्यादा प्रसन्न हुए उन्होंने उससे पूछा कि बेटा मैं इतना गलत कैसे हो सकता हूं तुमने पहले प्रैक्टिस में तो कभी इतना अच्छा नहीं किया आज तुमने इतना अच्छा कैसे खेल लिए तो इस पर लड़के ने जवाब दिया कि कोच आज मेरे पिताजी मुझे खेलते हुए देख रहे थे।

 कोच तो जानते थे कि उसके पिताजी हर दिन उसकी प्रैक्टिस देखने के लिए आते थे  तो वे आज भी उसी स्थान की तरफ गए जहां उन जहां कृष्णा के पिताजी बैठा करते थे परंतु उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि आज उसके पिताजी वहां नहीं बैठे थे इस पर कोच ने कृष्णा से पूछा कि तुम्हारे पिताजी आज क्यों नहीं आए हैं तो इस पर कृष्णा ने कहा कि कुछ मैंने आपको कभी बताया नहीं कि मेरे पिताजी अंधे हैं और और उन्होंने मुझे कभी क्रिकेट खेलते हुए नहीं देखा परंतु 4 दिन पहले उनका निधन हो गया और  आज वह पहली बार ऊपर से मुझे खेलते हुए देख रहे हैं ।   

Story By Hardik  

कहानी से सीख - इस  कहानी से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि हमें सफलता पाने के लिए व्यक्ति को किसी बाहरी प्रेरणा की जरूरत नहीं होती है बल कि वह अपने  अंदर की प्रेरणा से सफलता को प्राप्त कर सकता है व्यक्ति को अपने भीतर उस प्रेरणा को पहचानने की आवश्यकता होती है जब वह उस प्रेरणा को पहचान जाता है तो वह स्वयं ही सफलता की ओर अपना मार्ग प्रशस्त कर लेता है तो हमारी आप सभी से यह विनती है कि आप भी अपने अंदर की उस प्रेरणा को पहचानिए और सफलता की और अपना मार्ग प्रशस्त कीजिए।

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