Moral Stories In Hindi For class 5


नमस्कार दोस्तों स्वागत है आप सभी का kahani station पर और आज हम फिर  लेकर आएं हैं आपके लिए कुछ  Moral Stories In Hindi for class 5 To 10 जिन्हें पढ़कर आपको कुछ सीखने को मिलेगा।

Moral Story in Hindi For Class 5 #1



ईमानदारी का काम
Moral Stories In Hindi For Class 5
Moral Stories In Hindi For Class 5


 देवलगढ़ सुख समृधि से सम्पन्न एक खुशहाल राज्य था, जहाँ के राजा सूर्यभान सिंह थे। सूर्यभान कम आयु में ही राजा बन गये थे क्योंकि उनके पिता प्रताप सिंह की लम्बी बीमारी के कारण मृत्यु हो गयी थी। 

राजा सूर्यभान सिंह भी अपने राज्य के प्रति बहुत चिंतित और कर्तव्यनिष्ठ रहते थे, उन्होंने अपने मेहनत और राज्य के प्रति समर्पण से देवलगढ़ को सर्वोच्च शिखर पर पहुँचा दिया था। राज्य के कार्यभार में राजा सूर्यभान सिंह इतने व्यस्त थे कि उन्हें अपने सुखों के बारे में कोई चिंता नही थी बल्कि उनकी दृष्टि में राज्य की प्रजाजन के सुख सर्वोपरि थे लेकिन उनकी माता जिन्हें राजमाता का सम्मान प्राप्त था, को हमेशा उनके भविष्य और भावी पीढ़ी के बारे में चिंतित रहती थी। समय व्यतीत होता गया और सूर्यभान सिंह को राजा बने पुरे पांच वर्ष पूर्ण हो चुके थे राज्य की प्रजा महाराज से बहुत खुश थी। 

एक दिन सांय के समय राजमाता ने सूर्यभान को अपने कक्ष में बुलाया और कहा- राजसिंहासन बिना राजा के अपूर्ण है ठीक उसी प्रकार जीवनसंगिनी के बिना पुरुष का जीवन अधूरा है।

माँ आप ये क्या कह रही हो? मेरे लिए मेरी प्रजा और उसके सुखो से बढकर और कुछ नहीं है- सूर्यभान बोले  

लेकिन तुम जो ये सब कर रहे हो  किसके लिए कर रहे हो? यह सब कुछ व्यर्थ है यदि तुम्हारे पीछे इसे सँभालने वाला कोई उत्तराधिकारी नहीं है- राजमाता ने कहा।

तुम्हारी विवाह की आयु भी बीत रही है अब तुम्हें अपने वंश को आगे बढाने के लिए विवाह करना होगा 

(माता की बातों पर महाराज सूर्यभान ने थोड़ी देर तक गहन चिंतन किया)

फिर उत्तर दिया जैसी आपकी इच्छा राजमाता मैं विवाह करने के लिए तैयार हूँ ।

राजमाता यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुई और अपने पुत्र को प्रेम से गले लगाया और रोते हुए कहने लगी मैं तुम्हारा विवाह सबसे सुंदर और सुयोग्य कन्या से करवाऊंगी ।

अगले दिन से ही राजमाता ने समस्त पड़ोसी राज्यों के राजाओं की पुत्रियों में से अपने पुत्र के लिए सुयोग्य कन्या का चयन करना शुरू कर दिया।

एक सप्ताह बाद राजा सुर्यभान का विवाह रतनगढ़ की राजकुमारी स्वर्णा के साथ संपन्न हुआ ।

विवाह में कई राज्यों के राजा उपस्थित थे उन्होंने राजा सूर्यभान और उनकी पत्नी को आशीर्वाद और कई उपहार भेट स्वरूप दिए राजा और रानी दोनों बहुत खुश थे।

विवाह के कुछ समय बाद महारानी स्वर्णा ने राजपरिवार को खुशखबरी सुना दी जिसे सुनने के लिए राजमाता के कान तरस रहे थे।

समय बीतता गया नौ माह पश्चात् राजमहल में नन्हें कुमारों ने जन्म लिया।

(महारानी ने दो जुड़वाँ बच्चों को जन्म दिया है- दासियों ने राजमाता को खुशखबरी सुनाई, राजमाता यह सुनकर बहुत खुश हुई कि हमारे कुल का दीपक आ गया)

महाराज सूर्यभान भी बहुत प्रसन्न हुए, वे दोड़ते हुए महारानी के कक्ष में गये और दोनों कुमारो को गोद में लेकर हंसने लगे राजमाता भी नजदीक ही खड़ी थी जिनके आँखों में ख़ुशी के आँसू छलक रहे थे।

महाराज ने महामंत्री को आदेश दिया कि समस्त प्रजा और पड़ोसी राज्यों को यह खुशखबरी पहुँचा दो सभी के घर मिठाई भी भेज दो।

जैसी आपकी आज्ञा महाराज- महामंत्री ने कहा और सभी बंदोबस्त खुद करने लगे।

महाराज सूर्यभान सिंह और पूरा राजपरिवार खुश था कई पड़ोसी राज्यों से बधाइयों के सन्देश आ रहे थे कुछ समय बाद महाराज ने दोनों का नामकरण करवाया एक का नाम विजय और दुसरे का नाम संजय।

दोनों पुत्र अब बड़े होने लगे महाराज स्वयं उन्हें युद्धकला, शत्रु सेना को घेरना, रणनीति सिखाते थे दोनों अब धीरे धीरे बड़े होने लगे उनका पराक्रम और वीरता की चर्चाए सभी राज्यों तक फैलनी लगी ।

दोनों ही बहुत वीर थे लेकिन संजय हर कार्य करने में छल करता था जबकि विजय हर कार्य ईमानदारी से करता था।

संजय हर कार्य में स्वयं को विजय से श्रेष्ठ सिद्ध करना करना चाहता था चाहे इसके लिए वो गलत तरीका ही न क्यों आजमाए क्योंकि संजय, विजय से ईर्ष्या करने लगा था।

विजय के माथे पर बचपन से एक तिलक का निशान था और संजय सोचता था कि कहीं इस वजह से विजय को पिताश्री राजा घोषित ना कर दे। लेकिन वास्तव में सूर्यभान दोनों पुत्रों से समान प्रेम करते थे।

एक दिन अचानक एक पड़ोसी राज्य ने दूसरे दुश्मन राज्य के साथ हाथ मिला दिया और युद्ध को ललकारा, महाराज सूर्यभान सिंह स्वयं अपने पुत्रों के साथ रणभूमि में उतर गया। युद्ध में राजा सूर्यभान की विजय हुई लेकिन युद्ध में सूर्यभान के पैर में जहरीला तीर लग गया, जिसके कारण इलाज़ के दौरान उन्हें अपना पाँव खोना पड़ा।

 राजा सूर्यभान चिंतित होने लगे और अपने महामंत्री को कहने लगे कि मैं इस अपूर्णता के साथ राज्य का उचित प्रकार से संचालन नहीं कर सकता इसलिए मुझे अपने दोनों पुत्रों में से सुयोग्य पुत्र को राजा घोषित करना होगा।

लेकिन महाराज ये हम सब जानते हैं कि राजकुमार विजय ही राजा बनने योग्य है- महामंत्री ने कहा।

ये मैं भी जनता हूँ लेकिन मैं ये नहीं चाहता कि संजय को ये बिल्कुल भी लगे कि मैंने उसके साथ पक्षपात किया है। इसलिए कोई ऐसा उपाय सुझाओ जिससे संजय के समक्ष विजय की ईमानदारी और समझदारी का प्रमाण प्रकट हो साथ ही उसे अपने बईमानी का आभास हो।

महामंत्री ने कुछ देर सोचा और महाराज को एक तरकीब बताई महाराज को भी वह तरकीब उचित लगी और उसे आजमाने लगे। उन्होंने तुरंत पहरेदार को आदेश दिया कि दोनों राजकुमारों को मेरे कक्ष में उपस्थित होने का संदेश दो।

पहरेदार फौरन गया और दोनों राजकुमारों को महाराज के कक्ष में ले आया।

दोनों राजकुमारों ने पूछा क्या बात है? पिताश्री आपने हमें बुलाया गया है?

महाराज ने दोनों राजकुमारों को एक एक बीज दिए और कहा इसे एक गमले में बोना और 1 माह तक इसकी देखभाल करना जिसका पौधा सुंदर और स्वस्थ होगा मै उसे भावी राजा घोषित करूँगा।

दोनों राजकुमारों ने ऐसा ही किया। अलग अलग गमले में बीज बोये और एक माह तक बहुत मेहनत की ताकि उनका पौधा स्वस्थ और सुंदर हो।

एक माह पश्चात दोनों राजकुमार अपने अपने गमलों के साथ महाराज के कक्ष में उपस्थित हुए, जहाँ उनकी माँ, राजमाता और महामंत्री पहले से मौजूद थे।

संजय अपने हरे स्वस्थ और सुंदर पौधे के साथ खड़ा था और मन ही मन मुस्कराने लगा कि पिताश्री मुझे ही भावी राजा घोषित करेंगे क्योंकि विजय के गमले में पौधा था ही नहीं।

महाराज ने दोनों के गमलों में देखा और मुस्कुराने लगे।

पिताश्री इससे पहले आप अपना फैसला सुनाए मैं कुछ कहना चाहता हूँ- विजय बोला। पिताश्री मैंने पूरे माह तक उस बीज की देखभाल की लेकिन उसमें से अंकुर तक नहीं फूटा।

महाराज फिर मुस्कुराये और अपना निर्णय सुनाया कि देवलगढ़ का भावी राजा विजय सिंह को घोषित किया जाता है।

यह सुनकर सब चकित हो गए कि शर्त को तो संजय ने पूरा किया लेकिन फिर भी विजय को राजा घोषित क्यों किया?

तब महाराज सूर्यभान ने सब कुछ स्पष्ट किया कि आखिर ये निर्णय क्यों? 

मैं यह सोचकर चिंतित हो रहा था कि मैं अपना भावी उत्तराधिकारी किसे घोषित करूँ तब महामंत्री ने मुझे एक योजना बताई । महामंत्री की योजना के अनुसार मैंने दोनों पुत्रों को सड़े हुए बीज दिए जिनसे पौधा तो दूर अंकुर तक नहीं फुट सकता था।

विजय ने अपनी ईमानदारी से माह भर मेहनत की और अपनी ईमानदारी का परिचय देते हुए खाली ही गमला लेकर आया जबकि संजय ने बईमानी से गमले में दूसरा पौधा लगा दिया।इससे स्पष्ट होता है कि राजकुमार विजय ईमानदारी से शासन करेगा और देवलगढ़ का मान सम्मान बनाये रखेगा।

सभी को यह निर्णय सबसे उचित लगा और संजय को भी अपनी गलती का अहसास हुआ। संजय ने पिताश्री ओर विजय से क्षमा मांगी अपने पुत्र को उसकी गलती का अहसास हो गया यह जानकर महाराज सूर्यभान को बहुत गर्व हुआ और संजय को अपनी सेना का सेनापति घोषित कर दिया।

कहानी से सीख - अपने कार्य को हमेशा मेहनत और ईमानदारी के साथ करो क्योंकि कड़ी मेहनत और ईमानदारी से ही कार्य को सर्वश्रष्ठ तरीके से किया जाना संभव होता है।

Moral Stories In Hindi For Class 5  #2

लगन और मार्गदर्शन

Moral Stories In Hindi For Class 5
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 बहुत समय पहले की बात है एक आदमी था उसका नाम था एलेग्जेंडर। अलेक्जेंडर वैसे तो बहुत मेहनती आदमी था परंतु उसे उसकी मेहनत के अनुरूप परिणाम प्राप्त नहीं हो रहा था। वह इस बात से बहुत ज्यादा दुखी रहा करता था ,उसे समझ में नहीं आ रहा था कि उसे क्यों सफलता प्राप्त नहीं हो रही है जबकि वह अत्याधिक  मेहनत कर रहा है।

उसने अपने कई दोस्तों से इस समस्या का समाधान जानने का प्रयास किया परंतु उसके किसी भी शुभचिंतक के पास उसकी इस समस्या का समाधान नहीं था। 

सबसे पहले वह अपने एक मित्र के पास गया जो एक सेठ के पास काम करता  था। वह सेठ  के पैसों का हिसाब किताब देखा करता था। वह उस सेठ के पास काम करके अच्छा खासा पैसा कमाता था और उसका जीवन  बहुत अच्छे से कट रहा था । 

 अलेक्जेंडर को लगा कि उसके इस मित्र के पास उसकी समस्या का समाधान अवश्य होगा जब उसने अपने मित्र से पूछा कि  ;"मित्र मैं बहुत ज्यादा मेहनत करता हूं, परंतु मुझे मेरे मेहनत के अनुसार फल प्राप्त  नहीं होता है मुझे क्या करना चाहिए।

 इस पर उसके मित्र ने उसे सुझाव देते हुए कहा कि " मित्र तुम वह काम करना शुरू करो जो मैं करता हूं।" 

इस पर अलेक्जेंडर अचंभित हुआ और उसने कहा "मित्र तुम तो  सेठ के पास काम करते हो और और वह मुझे काम पर क्यों रखेंगे? "

इस पर उसके मित्र ने जवाब दिया कि; "मित्र मैं तुम्हें सेठ के पास काम करने को नहीं कह रहा हूं मैं बस तुम्हें अपने काम करने का ढंग बदलने को कह रहा हूं!

अलेक्जेंडर को कुछ भी समझ में नहीं आया कि उसका मित्र आकर कहना क्या चाह रहा है।

 इसके बाद उसके मित्र ने उसे उसके पीछे आने को कहा एलेग्जेंडर अपने मित्र के पीछे गया और उसने देखा कि उसके मित्र की तिजोरी में बहुत सारे पैसे और जेवर थे । 

 एलेग्जेंडर के मन में विचार आया कि "उसके मित्र के पास इतने अत्यधिक पैसे कहां से आए!  माना कि सेठ उसे अच्छा पैसा देता था लेकिन इतना ज्यादा भी नहीं कि उसके बाद इतनी अधिक संपत्ति हो जाए। " 

जब उसने अपने मित्र से पूछा तो उसके मित्र ने बताया कि  उसने यह पैसे सेठ के हिसाब किताब में हेराफेरी करके प्राप्त किए हैं। उसने अलेक्जेंडर को भी यही सुझाव दिया कि तुम भी ऐसा ही करना प्रारंभ करो ।

एक क्षण के लिए एलेग्जेंडर के मन में भी यह करने का विचार आया परंतु उसके मन ने उसके लिए गवाही नहीं दी और उसने अपने मित्र के इस सुझाव को मानने से इंकार कर दिया और वहां से चला गया।

इसी प्रकार वो अपने कई मित्रों और  शुभचिंतकों के पास पहुंचा परंतु उसे अपनी समस्या का समाधान कहीं पर भी नहीं मिला।    

इसके बाद जब उसका सवाल ज्यों का त्यों बना रहा तो उसका मन बहुत ही निराश और हताश हो गया वह यूं ही इधर-उधर घूम रहा था कि तभी उसे एक महात्मा दिखाई दिए। 

 महात्मा और कोई नहीं बल्कि अरस्तु थे अलेक्जेंडर के मन में विचार आया कि एक बार इन महात्मा जी से भी चर्चा कर लेता हूं शायद मुझे अपनी समस्या का समाधान मिल जाए।

अतः एलेक्जैंडर महात्मा के पास पहुंचा उसने महात्मा जी को अपनी व्यथा सुनाई और उसका समाधान पूछा ।

उसकी व्यथा सुनने के बाद अरस्तु ने अलेक्जेंडर को उस समय  घर जाने को कहा और उसे कल सुबह नदी के किनारे मिलने को कहा।

अलेक्जेंडर को उस समय कुछ समझ में नहीं आया और वह घर चला गया ।

अगले दिन निश्चित समय पर वह नदी के किनारे पहुंच गया जहां अरस्तु पहले से ही मौजूद थे उन्होंने अलेक्जेंडर को अपने पास बुलाया और अपने साथ चलने को कहा।  

वह लोग धीरे-धीरे नदी की तरफ बढ़ने लगे।    

जैसे-जैसे महात्मा और एलेग्जेंडर आगे बढ़ रहे थे नदी का पानी और ज्यादा गहरा हो रहा था और एक स्थिति ऐसी आ गई थी कि  नदी का पानी दोनों के गले तक आ गया था तभी अरस्तू ने एलेग्जेंडर को पकड़कर उसका सिर पानी के अंदर डाल दिया अलेक्जेंडर का दम घुटने लगा और पानी से बाहर आने के लिए तड़पने लगा परंतु अरस्तु बलवान थे उन्होंने अलेक्जेंडर को पानी से बाहर नहीं आने दिया एलेग्जेंडर की सांस रुकने लगी और उसका पूरा शरीर नीला पढ़ने लगा तब अरस्तु ने उसे पानी से बाहर निकाल दिया पानी से बाहर आते ही एलेग्जेंडर जोर जोर से हांफने लगा ।

 अरस्तु अलेक्जेंडर को पानी से बाहर ले आए और कुछ देर आराम करने के बाद अरस्तु अपने सामान्य अवस्था में आ गया।

अलेक्जेंडर अरस्तु के इस व्यवहार से बहुत ज्यादा क्रोधित था ।उसने अरस्तु से पूछा महात्मा यदि आपको मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं देना था तो आप मुझे सीधे मना कर देते आपको ऐसे मेरी जान खतरे में डालने की क्या आवश्यकता थी इस पर अरस्तू ने हंसते हुए एलेग्जेंडर से पूछा "जब तुम पानी के भीतर थे तुम्हें सबसे ज्यादा किस चीज की आवश्यकता थी? इस पर अलेक्जेंडर ने जवाब दिया कि "हवा की "तो इस पर अरस्तू ने जवाब दिया कि      

  "जिस प्रकार  पानी के भीतर जीने के लिए तुम हवा के लिए तड़प रहे थे उसी प्रकार जब तुम कार्य करते समय सफलता के लिए तड़पोगे तो तुम अवश्य सफलता प्राप्त करोगे|"

इस कहानी से हमें दो शिक्षाएं मिलती हैं।

१ "सफलता को प्राप्त करने के लिए हमें अपने भीतर कार्य करते समय सफल होने की तड़प को जगाना होगा."  

 जब हम कार्य करते समय ही दृढ़ निश्चय कर लें कि हमें सफल होना ही है तो अवश्य ही सफलता हमारे कदम चूमेगी परंतु यदि हम कार्य करते समय ही हताश निराश हो जाएंगे तो हम सफलता के पास कभी नहीं पहुंच पाएंगे।

२:"हमें जीवन में हमेशा उचित मार्गदर्शक को खोजना होता है। यदि हम एक उचित मार्गदर्शक प्राप्त कर लेते हैं तो हमारे सफलता का मार्ग और भी अधिक आसान हो जाता है।" 

 इस संसार में गलत मार्ग पर ले जाने वाले कई लोग उपस्थित हैं परंतु उचित मार्ग पर ले जाने वाले लोगों की संख्या बहुत ही कम है अतः हमें जी  जान लगाकर उन लोगों को ढूंढना है जो हमें सफलता के मार्ग पर ले जा सके ना कि हमें सफलता से असफलता के मार्ग पर ले जाएं।

Moral stories in Hindi For Class 5 #3

अच्छे काम का अच्छा नतीजा

             

Moral Stories In Hindi For Class 5
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एक बार श्री कृष्ण और अर्जुन शहर में एक छोटी सैर टहलने के लिए गए। उन्होंने एक गरीब को पुजारी को भीख मांगते हुए देखा।

 अर्जुन को उस पर दया आ गई और उसने उसे 100 सोने के सिक्कों से भरा बैग दिया। पुजारी बहुत खुश हुआ और अर्जुन को धन्यवाद दिया। वह अपने घर के लिए रवाना हुआ। रास्ते में, उसने एक  व्यक्ति को देखा, जिसे मदद की ज़रूरत थी। 

 पुजारी चाहता तो उसे 2 - 3 सिक्के दे सकता था। लेकिन, उसने इसे अनदेखा करना चुना।

 वह अपने घर की ओर चल पड़ा। अचानक घर के रास्ते में, एक चोर ने उसके सिक्कों के बैग को लूट लिया और भाग गया।

 पुजारी फिर से गरीब हो गया और फिर से भीख मांगने चला गया। अगले दिन फिर से जब अर्जुन ने उसी पुजारी को भीख मांगते हुए देखा और वह हैरान रह गया कि सिक्कों से भरा बैग मिलने के बाद जो जीवन भर रह सकता है, पुजारी अभी भी भीख मांग रहा था!

 उसने पुजारी को बुलाया और उससे इसका कारण पूछा। पुजारी ने उसे पूरी घटना के बारे में बताया और अर्जुन को फिर से उस पर दया आ गई। इसलिए, इस बार उन्होंने उसे एक हीरा दिया।

 पुजारी बहुत खुश हुआ और घर के लिए रवाना हो गया और उसने फिर से किसी ऐसे व्यक्ति को देखा जिसे मदद की ज़रूरत थी लेकिन उसने फिर से अनदेखा करना चुना।

 घर पहुंचने पर, उसने सुरक्षित रूप से हीरे को पानी के एक खाली बर्तन में रख दिया, ताकि बाद में उसे भुनाया जा सके और एक समृद्ध जीवन जी सके। उसकी पत्नी घर पर नहीं थी। 

वह बहुत थक गया था इसलिए उसने एक झपकी लेने का फैसला किया। बीच में, उनकी पत्नी घर आई और पानी के उस खाली बर्तन को उठाया, पानी भरने के लिए नदी के करीब चली गई। उसने बर्तन में हीरे को नहीं देखा था।

 नदी में पहुंचने पर, उसने पूरे बर्तन को बहने के लिए बहते नदी के पानी में डाल दिया। उसने घड़ा भर दिया लेकिन हीरा पानी के बहाव के साथ चला गया!

जब पुजारी उठा, तो वह बर्तन देखने गया और अपनी पत्नी से हीरे के बारे में पूछा। उसने उससे कहा, उसने इस पर ध्यान नहीं दिया था और यह नदी में खो गई होगी।

 पुजारी अपनी बुरी किस्मत पर विश्वास नहीं कर सका और फिर से भीख मांगना शुरू कर दिया। फिर से अर्जुन और श्री कृष्ण ने उसे भीख मांगते हुए देखा और अर्जुन ने इसके बारे में पूछताछ की। अर्जुन को बुरा लगा और वह सोचने लगा कि क्या इस पुजारी का जीवन कभी सुखी रहेगा।

 श्री कृष्ण जो भगवान के अवतार हैं, मुस्कुराए। श्री कृष्ण ने उस पुजारी को एक सिक्का दिया जो एक व्यक्ति के लिए लंच या डिनर खरीदने के लिए पर्याप्त नहीं था। अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा, "भगवान, मैंने उन्हें सोने के सिक्के और हीरे दिए, जो उन्हें एक समृद्ध जीवन दे सकते थे, फिर भी इससे उन्हें मदद नहीं मिली। सिर्फ एक सिक्का इस गरीब आदमी की मदद कैसे करेगा? ” श्री कृष्ण मुस्कुराए और अर्जुन से कहा कि वह पुजारी का अनुसरण करें और पता करें।

 रास्ते में, पुजारी सोच रहा था कि एक सिक्का श्री कृष्ण ने उसे दिया था, वह एक व्यक्ति के लिए दोपहर का भोजन भी नहीं खरीद सकता है। वह उसका क्या करेगा ?

  उसने एक मछुआरे को देखा जो अपने जाल से मछली निकाल रहा था। मछली संघर्ष कर रही थी। पुजारी को मछली पर दया आई।

 उसने सोचा कि यह एक सिक्का मेरी किसी समस्या को तो हल नहीं कर सकता,क्यों ना मैं मछली को ही बचा लूं।

 तो पुजारी ने मछुआरे को वह सिक्का मछली के दाम के रूप में दे दिया और मछली को अपने साथ ले गया। उसने मछली को अपने छोटे से पानी के बर्तन में डाल दिया जिसे वह हमेशा अपने साथ ले जाता था।

 मछली पानी के एक छोटे से बर्तन में संघर्ष कर रही थी, एक हीरा मुंह से बाहर फेंक रही थी! पुजारी खुशी से चिल्लाया, "मुझे मिल गया, मुझे मिल गया"। उसी बिंदु पर, जिस चोर ने 100 सोने के सिक्कों के पुजारी का बैग लूटा था, वह वहां से गुजर रहा था। उसने सोचा कि पुजारी ने उसे पहचान लिया और उसे सजा मिल सकती है। वह घबरा गया और पुजारी के पास भागा। उसने पुजारी से माफी मांगी और 100 सोने के सिक्कों से भरा अपना बैग लौटा दिया। पुजारी विश्वास नहीं कर सकता कि अभी क्या हुआ।

 अर्जुन ने यह सब देखा और कहा, "हे भगवान, अब मैं आपका नाटक समझता हूं"।

 नैतिक: जब आपके पास दूसरों की मदद करने के लिए पर्याप्त है, तो उस अवसर को जाने न दें। आपके अच्छे कर्म हमेशा आपके लिए चुकाए जाएंगे।

Moral Story In Hindi For  in  5 #4

ईश्वर से सहायता

Moral Stories In Hindi For Class 5
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नदी के किनारे एक छोटा सा गाँव था। हर कोई खुशी से रहता था और गाँव के मंदिर (चर्च) में नियमित प्रार्थना करता था। मानसून के मौसम में एक बार भारी बारिश हुई। नदी बहने लगी और गाँव में बाढ़ आ गई। सभी ने अपने घरों को खाली करना शुरू कर दिया और सुरक्षित स्थान पर जाने के लिए निकल पड़े।

 एक आदमी मंदिर (चर्च) भाग गया। वह जल्दी से पुजारी के कमरे में गया और उससे कहा, “बाढ़ का पानी हमारे घरों में घुस गया है और यह जल्दी से बढ़ रहा है। और पानी भी मंदिर में प्रवेश करने लगा है। हमें गाँव छोड़ना होगा क्योंकि कुछ ही समय में यह पानी के नीचे डूब जाएगा! सभी लोग सुरक्षित स्थान पर जाने के लिए निकल गए हैं और आपको साथ आना होगा। पुजारी ने उस आदमी से कहा, “मैं तुम सब की तरह नास्तिक नहीं हूं और मुझे भगवान पर पूरा भरोसा है। मुझे भगवान पर भरोसा है कि वह मुझे बचाने आएगा। मैं मंदिर से नहीं जाऊंगा, तुम जा सकते हो! ” तो, आदमी चला गया।

 जल्द ही, जल स्तर बढ़ने लगा और कमर की ऊंचाई तक पहुंच गया। पुजारी डेस्क पर चढ़ गया। कुछ मिनटों के बाद, नाव वाला एक व्यक्ति पुजारी को बचाने के लिए आया। उन्होंने पुजारी से कहा, "मुझे ग्रामीणों ने बताया कि आप अभी भी मंदिर के अंदर हैं, इसलिए मैं आपको बचाने आया हूं, कृपया नाव पर चढ़ें"। लेकिन पुजारी ने फिर से उसे वही कारण बताने से मना कर दिया। तो नाव वाला चला गया।


पानी बढ़ता रहा और छत तक पहुँच गया, इसलिए पुजारी मंदिर के शीर्ष पर चढ़ गया। वह उसे बचाने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करता रहा। जल्द ही हेलिकॉप्टर आया, उन्होंने पुजारी के लिए रस्सी की सीढ़ी को गिरा दिया और उस पर चढ़ने और हेलीकॉप्टर के अंदर जाने को कहा ताकि वे उसे सुरक्षित स्थान पर ले जा सकें। लेकिन पुजारी ने उसे फिर से वही कारण बताकर जाने से मना कर दिया! इसलिए हेलीकॉप्टर ने दूसरों की खोज और मदद करना छोड़ दिया।

 अंत में, जब मंदिर लगभग पानी के नीचे डूब गया, तो पुजारी ने अपना सिर ऊपर रखा और शिकायत करना शुरू कर दिया, "हे भगवान, मैंने आपको जीवन भर पूजा की और आप पर मेरा विश्वास बना रहा! तुम मुझे बचाने के लिए क्यों नहीं आए? " भगवान उसके सामने प्रकट हुए और मुस्कराते हुए बोले, “अरे पागल, मैं तुम्हें तीन बार बचाने आया था! मैं आपसे अन्य गाँवों के साथ सबसे सुरक्षित जगह छोड़ने के लिए कहने के लिए आपके पास दौड़ कर आया था, मैं एक नाव के साथ आया था, मैं एक हेलीकाप्टर के साथ आया था! अगर आपने मुझे नहीं पहचाना तो मेरा क्या दोष है?

 पुजारी को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने माफी मांगी। उन्हें एक बार फिर सुरक्षित स्थान पर जाने का मौका मिला, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया।

 नैतिक: जीवन में, अवसर बिना किसी याद के अनजाने में आते हैं। हम इसे पहचानने में विफल रहते हैं और शिकायत करते रहते हैं कि जीवन ने हमें सफल जीवन जीने का अवसर नहीं दिया। हमेशा बेहतर जीवन बनाने के लिए आपको हर मौका मिलता है।

Moral stories in Hindi for class 5 #5

      चुहे और हाथी: एक दूसरे के साथी

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बहुत समय पहले एक खूबसूरत शहर था जिसमें बहुत सारे बड़े मंदिर और घर थे।  शहर समृद्ध था और इसके निवासी हमेशा बहुत खुश और हंसमुख थे। 

शहर के करीब एक बड़ी और साफ झील थी।  झील में पानी बहुत मीठा था। 

 लेकिन समय बीतने के साथ, शहर खंडहर में बदल गया और इसके निवासी दूर-दूर के शहरों और शहरों में चले गए।

  वे अपने मवेशियों, बैल, बकरियों और घोड़ों सहित अपने सभी सामान ले गए।

  यहां तक ​​कि आवारा कुत्तों और बिल्लियों ने शहर के निवासियों का पालन करने का फैसला किया और उनके साथ बाहर चले गए।  

केवल शहर के चूहों ने वापस रहने का फैसला किया।  यहां तक ​​कि किसी भी निवासी के बिना, शहर में प्राकृतिक वनस्पति ने चूहों को पर्याप्त भोजन दिया जो उन्होंने वापस रहने का फैसला किया।  

शहर में बहुत सारे फलों के पेड़ थे।  वे अब शहर में उगने वाले विभिन्न प्रकार के फल और सब्जियां खा सकते थे।  

धीरे-धीरे, चूहे संख्या में बढ़ते गए और पूरा शहर चूहों के शहर में बदल गया!

कई पीढ़ियों ने शहर में एक साथ रहना शुरू कर दिया।  दादा-दादी, माता-पिता, चाचा, चाची, चचेरे भाई और बहुत सारे और बच्चे चूहों के बहुत सारे थे।  

यह एक बड़ा चूहे का परिवार था।  वे अपने स्वयं के त्यौहारों और मिलन-समारोह आयोजित करते थे।  

वे एक-दूसरे का बहुत ध्यान रखते थे, बीमारी और दुःख में।  शहर से दूर, बहुत घना जंगल था। 

एक विशाल नदी जंगल से गुजरती थी, जो जंगल में रहने वाले सभी जानवरों को साफ पानी की आपूर्ति करती थी।

  जानवरों के बीच, हाथियों का एक बड़ा झुंड था।  हाथी जंगल में अन्य जानवरों के साथ मेल खाते थे।  

जंगल ने उन्हें पर्याप्त भोजन, पानी और आश्रय प्रदान किया।

एक गर्मी के दौरान, बारिश बहुत कम होने के कारण नदी सूख गई।  जंगल के जानवर प्यास से मरने लगे। 

हाथी झुंड की रानी ने सभी युवा हाथियों को पानी की तलाश में सभी दिशाओं में जाने के लिए कहा। 

 कुछ दिनों के बाद, हाथियों में से एक रानी हाथी के पास वापस आई और उसे चूहे शहर के पास की झील के बारे में बताया। 

रानी हाथी ने एक बार झुंड को जंगल छोड़ने और झील की ओर बढ़ने का आदेश दिया।  जैसे ही झुंड ने झील को देखा, वे उसकी ओर दौड़ने लगे।  

वे कई महीनों से पानी में नहीं थे और झील की ओर जाने से खुद को रोक नहीं पाए।  उनके उत्साह में, उन्होंने ध्यान नहीं दिया कि सैकड़ों चूहे उनके पैरों के नीचे रौंद रहे थे। 

चूहों ने खुद को बचाने की कोशिश की, लेकिन कई लोग मारे गए और घायल हो गए।

  उन्हें यह भी डर था कि झील से वापस आने पर हाथी अनजाने में कई और लोगों को रौंद देंगे।  

एक बूढ़े चूहे ने सुझाव दिया कि वे जाकर रानी हाथी को पूरी घटना सुनाएँ।  इसके अलावा, उन्हें रानी हाथी को किसी अन्य मार्ग से झुंड ले जाने का अनुरोध करना चाहिए।

चूहों ने पुराने माउस(चूहो का राजा) द्वारा सुझाए अनुसार किया।  रानी हाथी को उस नुकसान के लिए बहुत खेद था।


जो झुंड ने चूहों के शहर पर लाया था।  उसने चूहों को आश्वासन दिया कि झुंड जंगल में वापस जाते समय एक अलग रास्ता लेगा और चूहों के शहर के पास कभी नहीं आएगा।  

पुराने माउस ने रानी को उनकी चिंता को समझने के लिए धन्यवाद दिया।  

उन्होंने रानी से यह भी कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो हाथियों की मदद के लिए चूहे का परिवार हमेशा तैयार रहेगा।

कई महीने गुजर गए।  पास के राज्य का राजा एक सेना बढ़ा रहा था और अपनी रेजिमेंट(सेना)के लिए बहुत सारे हाथी चाहता था।  

उसके सेवक जंगल में गए और हाथियों को पकड़ने के लिए जाल बिछाया।  गहरी खाइयों को खोदा और उन्हें पत्तियों से ढक दिया और उन पर बहुत सारे केले रखे। 

 हाथी, केलों के लिए बाहर निकलने की कोशिश करते हुए जाल में गिर गए।  नौकरों ने फंसे हाथियों को अन्य फंसे हाथियों की मदद से बाहर निकाला।  

एक बार खाइयों से निकलने के बाद, नौकरों ने उन्हें मोटी रस्सियों की मदद से पेड़ों से बांध दिया और राजा को सूचित करने के लिए वापस चले गए।  

रानी हाथी उन सब में से एक थी जो फंसी नही।  वह शांत रही और भागने का उपाय सोचने लगी।

एक बार, उसने पुराने माउस के बारे में सोचा और आवश्यकता पड़ने पर हाथियों की मदद करने का अपना वादा निभाया। 

उसने एक युवा हाथी को बुलाया, जो खाई में नहीं गिरा था और अभी भी स्वतंत्र था।  उसने युवा हाथी को चूहों की नगरी में जाने और पूरी घटना बताने को कहा।

 युवा हाथी ने निर्देश के अनुसार किया।  जल्द ही, हजारों चूहे ज़रूरत के इस घड़ी में अपने दोस्तों की मदद के लिए जंगल की ओर दौड़ पड़े।

मिनटों के भीतर, उन्होंने अपने तेज दांतों से रस्सियों को ढीला कर दिया। और कहने लगें  हाथियों को हम फिर से मुक्त करते हैं।

रानी हाथी ने पुराने माउस को वादा याद करने और हाथियों को उनके कैद से छुड़ाने के लिए धन्यवाद दिया।  बूढ़ा चूहा खुश था कि चूहे हाथियों की मदद करने में सक्षम थे और इस तरह कर्ज चुकाते थे।


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