Moral Stories In Hindi For Class 7  

    नमस्कार मित्रों , एक बार फिर से स्वागत है आपका kahanistation पर और आज हम लेकर आए हैं आपके लिए 3 best Moral Stories In Hindi जिन्हें पढ़कर आपको मनोरंजन के साथ साथ कुछ सीखने को भी मिलेगा।

Moral Stories In Hindi For Class 7 #1

हीरे की पहचान

 

      एक बार की बात है सज्जननगर नामक नगर में एक जौहरी रहता था।उसका नाम जसवंत था वह नगर में अपने पत्नी और पुत्र रविकांत के साथ रहता था। वह और उसका परिवार बहुत सुखी जीवन व्यतीत कर रहे थे। जसवंत नगर का ही नहीं बल्कि आस-पास के राज्यों और नगरों में बहुत सुप्रसिद्ध था।लोग तो यह भी मानते थे कि जसवंत के जैसा जौहरी कोई ना तो हुआ है और न ही कभी होगा।वह सोना, चांदी से लेकर हीरे तक की पहचान केवल हाथ लगाकर ही कर देता था कि कौन सा असली है और कौन सा नकली। 
                
उसका व्यापार इतना फैला हुआ था कि उसका कई राज्यों में रोज का आना जाना लगा रहता था कभी यहाँ तो कभी वहाँ।सभी लोग और पड़ोसी राज्यों के राजा भी उस पर बहुत विश्वास करते थे, सभी उसकी बहुत इज़्ज़त भी करते थे। 

Moral Stories In Hindi For Class 7
Moral Stories In Hindi For Class 7
एक दिन जब वह पड़ोसी राज्य सिंहगढ़ हीरों का लेन-देन करने जा रहा था तो रास्ते में उसे एक वृद्ध और अंधा किसान दिखाई दिया जो अपने खेत में अकेले फावड़ा लेकर खेत जोतने का प्रयास कर रहा था।जसवंत बहुत विनम्र हृदय वाला था उससे यह सब देखा नहीं गया और मदद करने के लिए खेत में चला गया। 

वह वृद्ध किसान के पास गया और कहा- आप इतनी वृद्ध अवस्था में अकेले ही खेत में काम क्यों कर रहे हो?
   
(वृद्ध किसान को आभास हुआ कि कोई उसके पास आया है और पहली बार कोई उसकी हालत देख कर उसके पास आया है उससे उसकी आंख भर आयी) 

 किसान के आंखों से आँसू निकल आये और कहने लगा -हे भद्र पुरुष! मेरा इस संसार में कोई नहीं है जो मेरी मदद करे लेकिन पापी पेट सवाल है भोजन प्राप्त करने के लिए कुछ तो करना होगा इसलिए मैं अकेले ही खेत में काम कर रहा हूँ।

किसान ने कहा- कौन हो भाई और कहाँ से आये हो? जसवंत ने अपना परिचय दिया और बताया कि मैं आपकी मदद करना चाहता हूँ। 

 नहीं नहीं तुम क्यों ये सब काम करोगे तुम तो जौहरी हो और अपने काम के लिए जा रहे हो तुम अपने गंतव्य की ओर जाओ- वृद्ध किसान ने स्नेह भरी आवाज में कहा।

 जसवंत ने कहा- मैं आपकी मदद करूँगा इससे मुझे बहुत खुशी मिलेगी। उसने फावड़ा लिया और वृद्ध किसान को पेड़ की छाया में बैठा दिया।

इसके बाद स्वयं फावड़ा लेकर खेत जोतना शुरू कर दिया। खेत जोतना शुरू ही किया था कि थोड़ी देर में जैसे ही जसवंत ने फावड़ा खेत में मारा अचानक फावड़ा जमीन में एक कठोर चीज़ पर टकराने की आवाज आई। 


 दोनों (किसान और जसवंत) चौक गए कि आखिर खेत में क्या हो सकता है? जसवंत ने कहा- रुको मैं देखता हूँ कौन सी चीज है? उसने ऊपर-ऊपर की मिट्टी हाथ से हटाई तो देखते ही कहा- ये क्या यहाँ तो एक संदूक है।


वृद्ध किसान ने कहा- जसवंत बेटा उसे खोल कर के देखो तो सही उसके अंदर है क्या? जसवंत ने संदूक को उठाकर खेत पर रखा और उसे धीरे से खोला, संदूक खोलते ही उसकी आंखें खुली की खुली रह गयी। 

जसवंत ने कहा- आपकी मेहनत सफल हो गयी बाबा इसमें दो हीरे हैं, बिल्कुल एक जैसे रंग से लेकर बनावट सब कुछ एक जैसी। वृद्ध किसान भी चौक गया। 

लेकिन दोनों हीरे असली है या नकली ये देखना पड़ेगा। जसवंत ने किसान को बताया कि इनमें से असली और नकली हीरे की पहचान करने के लिए हमें दोनों हीरों को थोड़ी देर धूप में रखना होगा, जो असली हीरा होगा वो धूप में भी ठंडा रहेगा जबकि नकली हीरा धूप में गर्म हो जाएगा। 

 जसवंत ने ऐसा करके दोनों हीरो में से असली और नकली हीरे की पहचान कर ली और उन्हें अलग अलग रंग की थैली में रखकर उन्हें किसान के हाथों में रख दिया। 
 ये क्या…! ये क्या कर रहे हो बेटा इन हीरों को मुझे क्यों दे रहे हो। क्योंकि बाबा ये तुम्हारी मेहनत का फल है तुम जो अकेले इतना काम करते हो ये उसी का फल है।इसे अपने पास ही रखिये। नहीं नहीं.... मैं बूढ़ा इन हीरों का क्या करूँगा?

 अगर किसी को इनके बारे में पता चल गया तो वो मुझे लूट लेंगे और यदि तुम यहाँ नहीं आते तो मुझे तो पता ही नहीं चलता कि इस संदूक में हीरे हैं। और वैसे भी तुम जौहरी हो तुम से ज्यादा हीरे की कीमत और कोई नहीं जान सकता।

 तुम कृपया इन हीरों को अपने ही पास रखो- बूढा किसान बोला। 

वृद्ध किसान की भावनाओं का आदर करते हुए जसवंत ने हीरों को अपने ही पास रखा और कहा मैं इनका सौदा कभी भी नही करूँगा इन्हें हमेशा संभाल के रखूंगा। इसके बदले में जसवंत ने बूढ़े किसान को 100 स्वर्ण मुद्रायें दी। 

इसके बाद जसवंत और बूढा किसान दोनों सिंहगढ़ की ओर चले गए। कुछ दिन सिंहगढ़ में रहने के और अपना काम करने के बाद जसवंत जब अपने नगर लौटा तो उसने बिना अपनी पत्नी और बेटे को बताए उसने दोनों हीरों को छिपा दिया। जसवंत का व्यापर अब और अच्छा चलने लगा था और उसकी ख्याति दूर दूर तक फैल गयी थी। 

एक दिन जसवंत अपनी दुकान में एक हीरे को तराश रहा था अचानक हीरे का एक टुकड़ा टूटकर उसकी आंख में चुभ गया और वह एक आंख से नेत्रहीन हो गया।

 इस अपूर्णता के साथ जसवंत अपने व्यापर पर उचित ध्या UIन नही दे पा रहा था ऐसे में उसने अपने पुत्र रविकांत को जौहरी का काम सीखाना शुरू कर दिया।रविकांत भी अच्छे तरीके से काम सीखने लग गया। समय बीतता गया और रविकांत जौहरी के काम में माहिर हो गया।

एक दिन जसवंत ने अपने पुत्र को बुलाया और कहा बेटा अब मेरा शरीर मेरा साथ नहीं दे रहा इसलिए मैं तुम्हें एक राज़ बताना चाहता हूँ जिसे मैंने आजतक तुमसे छिपाकर रखा था। 

क्या हुआ पिताजी क्या बताना चाहते हो?- रविकांत ने पूछा। 

बेटा मेरे पास दो हीरे हैं जिन्हें मैंने आजतक तुमसे छिपाकर अपनी कुर्सी के अंदर रखा है, लेकिन उनमें से एक नकली है और एक असली जिसकी कीमत बहुत अधिक है..जसवंत ने उनके बारे में सब कुछ बता दिया कैसे मिले, कहाँ मिले? सब कुछ..। 

तुम मेरी मृत्यु के बाद उन्हें निकाल देना और उनका उचित सौदा कर बेच देना। इसके बाद एक दिन अचानक उसके पिता की लंबी बीमारी के कारण मृत्यु हो गयी और दुकान का सारा काम उसके सिर आ गया। 

कुछ दिन बाद उसने अपनी पिता की कही बात याद आयी और उसने वो हीरे कुर्सी से निकाल लिए ।उसने अपने पिता की कही बात के अनुसार असली हीरे की पहचान भी कर ली थी और उसने असली हीरे को बेचने का सोचा लेकिन उस हीरे को देखकर उसके मन में लालच आया और उसने सोचा इन हीरों के बारे में अब केवल मैं जानता हूँ क्यों ना अधिक लाभ प्राप्त करने की एक योजना बनाई जाय। उसने एक योजना तैयार भी कर ली। 

इसी योजना को ध्यान में रखते हुए वह एक पड़ोसी राज्य सितारगढ़ के राज दरबार में गया और वहाँ के राजा को चुनौती दी कि "मेरे पास एक असली हीरा और एक नकली हीरा है। क्या आपके राज्य में कोई ऐसा जौहरी है जो उनकी पहचान कर पाए।"

 यदि किसी जौहरी ने उसकी पहचान कर दी तो मैं असली हीरे को आपके राजकोष में जमा कर दूंगा और अगर आपका जौहरी उसकी पहचान न कर पाया तो आपको हीरे का मूल्य चुकाना होगा। 

राजा ने भी चुनौती स्वीकार की और अपने राज्य के सभी विख्यात जौहरियों को असली और नकली हीरे की पहचान करने के लिए बुलाया लेकिन सभी जौहरी असफल रहे और हारकर राजा को असली हीरे का मूल्य चुकाना पड़ा। रविकांत की योजना सफल हुई और वह बहुत खुश हुआ।और उसने वहाँ से प्रस्थान किया। 

इसी योजना साथ वह बहुत राज्यों में गया और सभी राज्यो के राजाओं को चुनौती दी हर बार रविकांत की योजना सफल हो रही थी और वह दिन प्रतिदिन और अधिक अमीर होता जा रहा था। 


लेकिन इस बार वह सिंहगढ़ राज्य पहुंचा और वहाँ के राजा हेमराज सिंह को भी चुनौती दी राजा ने चुनौती स्वीकार की और राज्य के सभी जौहरियो को राजदरबार में आने का न्यौता दिया। क्योंकि यह सर्दियों का समय था इसलिए राजा ने राजदरबार धूप में लगा रखा था।सभी जौहरी और समस्त जनता नियत स्थान पर पहुँचे । 

राजा हेमराज ने सभी जौहरियों और जनता को रविकांत की चुनौती के विषय में बताया। सभी उत्सुक थे कि कौन सा जौहरी असली हीरे की पहचान कर पायेगा। सभी जौहरी एक एक कर हीरे की पहचान करने के लिए आगे आये लेकिन एक जैसे रूप रंग बनावट के दो हीरो में से असली हीरे की पहचान कोई न कर पाया। 

राजा को लगा कि वह शर्त हार गया लेकिन उसी समय एक नेत्रहीन वृद्ध व्यक्ति जनसमूह में आगे आया और राजा से आज्ञा मांगी- महाराज क्या मैं एक बार प्रयास करना चाहता हूँ। राजा ने आज्ञा दे दी और वृद्ध आगे बढ़ा। उसने हीरों को हाथ में लिया और उन्हें धूप में ले गया थोड़ी देर बाद उसने असली हीरे की पहचान कर दी।

रविकांत चौक गया और उसके पास जाकर हीरे को हाथ में लिया। क्या वही असली हीरा है क्या?- राजा ने रविकांत से पूछा। 

रविकांत ने कहा जी महाराज यही असली हीरा है। राजा हेमराज बहुत खुश हुए। लेकिन तुमने ये किया कैसे?- राजा ने वृद्ध व्यक्ति से पूछा।


फिर वृद्ध व्यक्ति ने पूरी बात बताई कि ये दोनों हीरे रविकांत के पिता जौहरी जसवंत को मेरे खेत में मिले थे। उन्होंने ही मुझको बताया था असली हीरा धूप में भी ठंडा रहता जबकि नकली काँच का हीरा धूप में गर्म हो जाता है। 

 इस प्रकार मैने असली हीरे की पहचान कर ली। रविकांत बहुत निराश हुआ और उसने असली हीरा राजा हेमराज को सौंप दिया।


Moral Stories In Hindi For Class 7 #2

सौतेली बेटी


मीना एक छोटी बच्ची थी जिसके जन्म के समय ही उसकी मां की मृत्यु हो गई। उसके जन्म को उसकी मां की मौत का कारण बता कर उसके गांव वालो ने उसे शापित और मनहूस बता दिया।
Moral Stories in Hindi For Class 7
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मीना जब थोड़ी बड़ी हुई तो उसे उस प्रकार प्यार दुलार नहीं मिला जिसकी वह हकदार थी।
घर में केवल उसकी दादी मां ही थी जो उसके लिए सहानुभूति रखती थीं , वह अपनी दादी मां की लाडली थी।

जब वह 4 वर्ष की हो गई तो उसके पिता ने दूसरी शादी कर ली ; जिससे उनको एक लड़का हुआ।

लड़के का नाम रवि रखा गया और उसके आने से घर में खुशियां मनाई गई। रवि को अच्छी शिक्षा के लिए अंग्रेजी स्कूल में भेजा गया जबकि मीना को स्कूल जाने की अनुमति नहीं मिली।

मीना पढ़ना चाहती थी , उसकी दादी ने उसके लिए मीना के पिता को मना लिया और उसे भी एक सरकारी स्कूल में भेज दिया गया।

मीना की नई मां ( सौतेली मां ) उसे बिल्कुल पसंद नहीं करती थी । वह उससे घर के सारे काम करवाती और उससे मार पीट भी करती थी। मीना के पिता भी उसका साथ नहीं देते।

एक दिन मीना ने रवि की गेंद गलती से खो दी।जब रवि रोने लगा तो उसकी मां ने मीना को बहुत मारा।

मीना की दादी उसे बचाने को पहुंच गई ।

अब रवि की मां को यह लगने लगा कि मीना कि दादी उसके बेटे का कभी भला नहीं होने देगी ; इसलिए उसने मीना के पिता को उसकी दादी के खिलाफ भड़काना शुरू कर दिया।

अंततः हुआ भी ऐसा ही ,एक दिन जब सुबह मीना स्कूल गई तो मीना के पिता उसकी दादी को लेकर वृद्धाश्रम गए और उन्हें वहीं रहने को कह दिया। 

दोपहर को मीना जब घर लौटी तो दादी मां को ना पाकर वह चिंतित हुई , उसकी सौतेली मां ने उसे बता दिया कि उसकी दादी वृद्धाश्रम में हैं।

मीना ने अपने पड़ोसी चाचा को यह बात बताई और उनसे प्रार्थना करने लगी कि उसे उसकी दादी के पास जाना है। वो एक अच्छे आदमी थे तो मीना की बात टाल नहीं पाए और उसे वृद्धाश्रम लेकर गए।

वहां पहुंचने पर पता चला कि मीना की दादी को जब उसके पिता वहां लेकर आए तो उन्होंने उसकी दादी को धक्का दिया जिस कारण उनके सिर पर चोट अायी है और वह अस्पताल में भर्ती हैं।

मीना और उसके पड़ोसी चाचा अस्पताल पहुंचे जहां उसकी दादी अपनी आखिरी सांसें गिन रही थी। जब वह उनसे मिली तो मीना की दादी ने पड़ोसी चाचा को उनकी संपत्ति के बारे में बताते हुए कहा कि उसका प्रयोग मीना को पढ़ने में करें, इतना कह कर वह चल बसी।

अपनी दादी की अंतिम इच्छा को पूरा करना चाहती थी साथ ही साथ उसने यह भी प्रण लिया कि वह अब कभी भी उसके पिता के घर नहीं जाएगी।

मीना के पड़ोसी चाचा ने उसे दूसरे शहर में गर्ल्स हॉस्टल भेज दिया जहां उसकी पढ़ाई भी हो रही थी।

दूसरी ओर रवि की मां खुश थी कि अब उसके बेटे की तरक्की के मार्ग में कोई भी नहीं आयेगा।

सालों बाद मीना पढ़ लिखकर कलेक्टर बन गई।पड़ोसी चाचा ने उसकी शादी भी एक बहुत अच्छे घराने में करवाकर उसे अपनी बेटी की तरह ही विदा किया।

एक दिन मीना को सरकारी काम से कहीं जाना था तो रास्ते में उसे एक बूढ़ा भीख मांगता हुआ दिखा जब वह उसके पास गई तो उसने उस आदमी को अपने पिता के रूप में पहचान लिया।

अपने पिता की यह हालत देखकर उसे रोना आ गया। वह अपनी सारी नाराजगी भूल गई और उन्हें अपने साथ ले गई । बाद में पता चला कि उसकी सौतेले भाई रवि ने उनकी सारी जायदाद को हड़प कर उन्हें घर से निकलवा लिया। उसकी सौतेली मां भी उनके साथ ही एक छोटे से झोपड़े में रह रही थी।

मीना अपनी सौतेली मां को भी अपने साथ ले आयी। मीना अपनी दादी मां की मौत को भुला नहीं पाई थी इसलिए उसने उन्हें कानूनी तरीके से इंसाफ दिलाया और अपनी सौतेली मां और अपने पिता को उनको घर वापस भेज दिया।

अब मीना कि सौतेली मां को समझ आ गया कि सौतेला या सगा खून से नहीं होता बल्कि प्रेम और स्नेह से ही रिश्ता मजबूत बन पाता है।

अपने कर्मों की वजह से अब ना उन्हें पुत्र का स्नेह प्राप्त हो पाया ना पुत्री का।


Moral Stories In Hindi For Class 7 #3

व्यक्तित्व का निर्माण



Moral Stories In Hindi For Class 7

मुन्ना और रामा दो दोस्त थे। वो एक दूसरे के पड़ोसी थे , उनकी उम्र भी लगभग बराबर ही थी । अतः मुन्ना और रामा एक ही स्कूल में एक ही क्लास (कक्षा) में पढ़ते थे। दोनों पक्के यार थे , पढ़ाई लिखाई के साथ साथ खेल कूद में भी अव्वल और शरारत में भी टॉपर ही थे।

मुन्ना के पापा एक हंसमुख इंसान थे और मुन्ना को हर कदम पर सपोर्ट (सहायता ) करते थे ; वहीं रामा के पिता अनुशासन और नियमों के बड़े सख्त इंसान थे।

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मुन्ना के पिता उसे पढ़ाई के साथ साथ खेल कूद के लिए भी प्रोत्साहित करते थे। हालांकि वह थोड़ा सख्त भी थे लेकिन उन्होंने मुन्ना को इंटरनेट , वीडियो गेम्स और अन्य किताबें ( कॉमिक्स ) भी खरीदकर दी थी।

मुन्ना की रुचि संगीत में भी थी तो उसके लिए वह एक गिटार खरीदकर लाए थे।

दूसरी तरफ रामा के पिता सिर्फ पढ़ाई को ही अहमियत देते थे। उनका मानना था कि बच्चों को अपनी क्लास की ही किताबें पढ़नी चाहिए। 
अन्य किताबों को पढ़कर उन्हें क्या फायदा है?
वह रामा को मुन्ना के साथ अधिक खेलने भी नहीं दिया करते थे।

रामा अपने पिता से बहुत डरता था। वह हमेशा दबी आवाज़ में ही बात करता था। वहीं मुन्ना अपने पिता की तरह खुशमिजाज था।

सालों बाद जब दोनों कॉलेज जाने योग्य हो गए तो दोनों का रिजल्ट लगभग बराबर होने के कारण उन्हें एक ही इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन मिल गया।

मुन्ना सभी से खुलकर बात कर पाता था जबकि 
रामा में आत्मविश्वास की कमी दिखाई देती थी, वह अपनी क्लास के बच्चों के सामने भी हिचकिचाता था।

कॉलेज ख़तम होने के बाद नौकरी का इंटरव्यू देना था। उसी समय शहर में एक बड़ी इंटरनेशनल कंपनी अपने ब्रांच के लिए कुछ नौकरी के पदों का ऑफर लेकर कॉलेज में लाई।

यदि उस कंपनी में किसी को नौकरी मिल जाती तो उसकी पूरी जिंदगी संवर सकती थी। अतः दोनों दोस्तों ने वह इंटरव्यू देने का निर्णय लिया।

इंटरव्यू के दिन तक रामा अपने कॉलेज की पुस्तकों को ही पढ़ रहा था ताकि उसे किसी भी सवाल में कोई दिक्कत ना हो।

इंटरव्यू का दिन आया दोनों दोस्त चल पड़े। और शाम को वापस आए।

फाइनल राउंड के लिए केवल उन्हीं दोनों का चयन हुआ था आखिर वह कॉलेज के सबसे बुद्धिमान लड़के थे।

फाइनल राउंड की डेट आने तक दोनों ने बहुत तैयारी करी ।

अब इंटरव्यू का फाइनल दिन आ गया। दोनों अपनी तैयारी से खुश थे। और इंटरव्यू समाप्त होने पर शाम को वे घर लौट गए।

रामा के पिता ने रामा से कहा - ' बताओ भई ! आज क्या पूछा? '

रामा ने कहा - ' किताबों से कुछ नहीं पूछा बस कुछ नए लोगों से मिलाया । '

अगले दिन कंपनी की तरफ से मुन्ना का सलेक्शन लेटर आया।

इंटरव्यू लेने वाले अधिकारी स्वयं उनके घर आए थे। रामा अपने दोस्त के लिए खुश था लेकिन वह अपने पिता की डांट खाने के लिए भी तैयार था।

 मुन्ना के पिता खुश थे जबकि रामा के पिता को यह लग रहा था कि उनका बेटा तो केवल पढ़ता ही है फिर उसका चयन क्यों नहीं हुआ?

इंटरव्यू लेने वाले अधिकारियों ने मुन्ना के पिता को तो बधाई दी ही साथ ही साथ उन्होने रामा के पिता को भी यह बताया कि आपके बेटे रामा और उसके दोस्त मुन्ना में पढ़ाई में कोई अंतर नहीं है।

कई मामलों में तो रामा पढ़ाई में मुन्ना से तेज है लेकिन इस पद के लिए हमें ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जो बुद्धिमान तो हो ही साथ ही साथ कंपनी के कर्मचरियों को खुश रख सके और दूसरी कंपनियों से भी डील कर सके।

मुन्ना को अपने आस पास के लोगों को खुश करना अच्छे से आता है जबकि आपके बेटे में आत्मविश्वास की कमी दिखाई देती है।

केवल यही एक कारण है जहां मुन्ना का सलेक्शन हुआ और रामा का नहीं।

रामा के पिता को सारी बात समझ आ गई। अब वे रामा के दोस्त की तरह बन गए ।

कुछ ही महीनों में रामा में काफी परिवर्तन आ गया और उसे भी एक दूसरी कम्पनी में काफी अच्छी नौकरी मिल गई।

कहानी से सीख -

केवल पढ़ाई से ही व्यक्ति सफल नहीं बन पाता है , सफलता के लिए पढ़ाई से अधिक आवश्यक है व्यक्तित्व का विकास। इसलिए हमेशा पढ़ाई के साथ साथ अपने व्यक्तिव और व्यवहार को सुधारने में ध्यान देना चाहिए।

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